Sunday, November 14, 2021

हमारी आवश्यकतायें बहुत थोड़ी थीं

 हमारी आवश्यकतायें बहुत थोड़ी थीं और मुझे जरूरत के मुताबिक कमा लेने की अपनी शक्ति में विश्वास था। मुझे सबसे बड़ी चिन्ता यह थी कि मेरी माताजी को उनके जीवन के इन अन्तिम दिनों में तकलीफ़ न उठानी पड़े या उनके रहन-सहन के ढंग में कोई खास कमी न आने पाये। मुझे यह भी फ़िक्र थी कि मेरी लड़की की शिक्षा में कोई बाधा न पड़े, जिसके लिये मैं उसका यूरोप रहना आवश्यक समझता था। इन सबके अलावा मुझे या मेरी पत्नी को रुपये की कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी। अथवा, इस तरह का हम ख्याल करते थे, क्योंकि हमें उसका कभी अभाव तो था नहीं। मुझे यकीन था कि जब ऐसा समय आयेगा कि हमारे पास रुपये की कमी पड़ेगी तो हमें दु:ख ही होगा। किताबें खरीदने की खर्चीली आदत का छोड़ना मेरे लिये शायद मुश्किल होगा।

-जवाहर लाल नेहरू की आत्मकथा मेरी कहानी से

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Friday, November 12, 2021

दुनिया से अलगाव अपने में कैदखाना है



'नियम तोड़ने की सजा जेल । जेल के नियम तोड़ने की सजा अलकाट्राज।'
यह उक्ति अलकाट्राज जेल की दुर्गंमता का इश्तहार है। जेल में खाने, पीने, रहने के इंतजाम तो थे लेकिन तन्हाई अपने में विकट सजा थी। जेल के अकेलेपन से जूझने के सबके अपने तरीके थे। जिम क्वीन नामक जेल के एक कैदी के हवाले से :
" दुनिया से अलग रहने का एहसास विकट ठंड से भी अधिक भयावह था। पागल होने से बचने के लिये मैंने एक खेल ईजाद क़िया। मैं अपनी कमीज से एक बटन नोच कर उसे हवा में उछाल देता था, गोल गोल कई चक्कर घूम जाता और फिर आंखे बंद करके अपने कोहनी और घुटनों के बल बैठकर वह बटन खोजा करता था। जब बटन मिल जाती थी, मैं फिर से यह क्रम तक तक दोहराया करता था जब तक चूर नहीं हो जाता था या मेरे घुटने इतने दर्द करने लगें कि आगे इसे न कर सकूं।"
ऐसी विकट जेल को पर्यटक की तरह देखने के लिहाज से हम वहां थे। हम वहां रहे कैदियों के कष्ट का एहसास ही कर सकते थे।
जेल में सबसे शुरुआत में सामूहिक स्नानागार था। सारे कैदी यहां इकट्ठा होकर नहाते थे। फिलहाल तो पानी बन्द था। लेकिन जब जेल आबाद होती होगी तो पानी भर जाता होगा। ऊपर पानी की पाइप लगी थीं। उन्ही के नीचे बैठकर कैदी नहाते थे।
आगे हाल में बैठाकर जेल के बारे में विस्तार से बताया गया। फिर जेल देखने गए। जेल की बैरक, गैलरी, खाने की जगह, वार्डन हाउस और जेल अधिकारी के ऑफिस देखे। जगह-जगह प्रमुख घटनाओं और व्यक्तियों के उल्लेख थे। इनमें जेल के अधिकारियों और कैदियों दोनों के किस्से बयान थे। जेल से भागने के प्रयासों के किस्से भी थे।
एक जगह पहुंचते ही तड़-तड़-तड़ गोलियों की आवाज सुनाई दी। लगा गोली चल गई। लेकिन फिर पता चला कि यह एक समय यहां जिस तरह कैदी भागे थे और उनको पकड़ने के लिए जैसे गोलियां चलाई गयीं थीं , उसका पुन: प्रस्तुतिकरण था। अमेरिका के प्रमुख स्थलों में अपने इतिहास को समय के अनुरुप संरक्षित करने की कोशिश काबिले तारीफ है।
अधिकांश बैरक साफ-सुथरी और खुली टाइप की थीं। बैरक क्या उनको लोहे के जंगले कहना ज्यादा मुफीद होगा। खतरनाक कैदियों के लिए डी ब्लाक में व्यवस्था थी। इनमें कभी-कभी अंधेरा भी कर दिया जाता। इस ब्लाक में कभी-कभी कई दिन तक रखा जाता कैदियों को लेकिन अधिकतम डी ब्लाक में रखने की अवधि 19 दिन की थी इंसान को इंसान से अलग करके कैद करके और सजा देकर उनका सुधार करने के तरीके के बारे में जेल वार्डन जेम्स जांसटन ने लिखा :
" जेल में अनुसासन के साथ सजा भी जुड़ी रहती है। आदेश मानने के लिए नियमित ट्रेनिंग अनुशासन है।"
जेल में मनोरंजन के लिए भी व्यवस्था थी। कुछ कैदी बेसबॉल खेलते थे। कुछ अकेले घूमते थे और उन चीजों को याद करते थे जिनसे वे वंचित थे। सामान्य कैदियों को शनिवार और इतवार को ढाई घण्टे मनोरंजन की अनुमति थी जबकि कठोर सजा वाले कैदी एक हफ्ते में एक घण्टे ही घूम सकते थे।
जेल में लाइब्रेरी का भी इंतजाम था। पढ़े-लिखे कैदी साल में 75-100 किताबें हर साल पढ़ते थे। 15000 किताबें थी लाइब्रेरी में। जेल के कैदी आम लोगों के मुकाबले ज्यादा गम्भीर किताबें पढ़ते थे। दार्शनिक किताबें ज्यादा पढ़ी जाती थीं।
लाइब्रेरी के बाद हम वहां का किचन भी देखने गए। बड़ा साफ-सुथरा किचन। उस समय प्रयोग किये जाने वाले सामान सहित किचन व्यवस्था दिखाई गयी थी। 21मार्च, 1963 को जो मीनू था उसके अनुसार सूखा अनाज, भाप से उबला गेंहू, उबला अंडा, दूध, फल, टोस्ट, ब्रेड, मक्खन और काफी शामिल थी। देखने मे तो यह आकर्षक लगता था लेकिन क्वालिटी कैसी होती होगी इसका अंदाज लगाना मुश्किल। एक कैदी को इसी बात पर सजा मिली कि उसके अनुसार उसको दी गयी काफी ठंडी थी और उसने बार-बार इसकी शिकायत की।
अनेक कैदियों के किस्से वहां लिखे मिले। जोसेफ डच बाउर नामक एक कैदी को एक स्टोर से 16.38 डॉलर की डकैती की सजा मिली 25 साल। 16.38 डॉलर मतलब 1217 रुपये 44 पैसे। मतलब 48 रुपये सत्तर पैसे की लूट के लिए एक साल की सजा। कैदी ने बताया कि भूख की तड़फ और पास में पैसे न होने के चलते उसने ऐसा किया। लगभग दो साल जेल में रहने के बाद वह पागल हो गया। अंतत: जेल से भागने की कोशिश करते पकड़े जाने पर उसको गोली मार दी गयी। मरने के समय जोसेफ की उम्र 40 साल थी।

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Wednesday, November 10, 2021

अलकाट्राज - एक दुर्गम जेल

 


अलकाट्राज की प्रसिद्धि एक किले से अधिक एक जेल के रूप में है। लगभग शुरू सन 1859 से ही इसकी शुरुआत हुई। 11 बगावती सैनिक किले में कैदी के रूप में रखे गए। गृह युद्ध के समय चोरी, हमले , बलात्कार , हत्या की सजा पाये सैनिक, राजद्रोह के अपराधी नागरिक और एक जहाज के नाविक दल को यहां बन्दी के रूप में रखा गया।
सेना ने जगह का उपयोग विभिन्न स्थानीय समुदाय के लोगों को और 1898 में हुए स्पेनिश अमेरिकन युध्द में बन्दी बनाये लोगों को भी रखा। 1907 में जब किले के रूप में इसका उपयोग बन्द हुआ तो इसकी सुरक्षा का जिम्मा नियमित सेना की टुकड़ी के स्थान पर अमेरिकन मिलिट्री गार्ड को सौंप दिया गया। सेना ने एक किले को एक विशाल जेल में तब्दील करना शुरु कर दिया।
1915 में इसका नामकरण अमेरिकन अनुसासन बैरक के रूप में किया। जल्द ही जल्द ही प्रथम विश्वयुध्द का विरोध करने वाले लोगों को भी कैदियों के रूप में रखा गया। 1930 की महामन्दी के समय इस द्वीप को हाई प्रोफाइल मजबूत सुरक्षा वाली जगह के रूप में प्रयोग किया गया।
1934 में इसे युध्द विभाग से लेकर न्याय विभाग को सौंप दिया गया और यह जगह संघ की जेल के रूप में बदल गयी। जिन 1545 लोगों को यहाँ रखा गया उनमें से कुछ ही बदनामी कैदी थे। इन कुख्यात कैदियों में से कुछ के नाम थे - अल स्कारफेस कैपाने, डाक बरकार, एल्विन क्रीपी कारपिस, जार्ज मशीन गन केली, फ्लायड हैमिल्टन और रॉबर्ट स्ट्राउड जिसने लेवनवर्थ जेल में बन्दी रहने के दौरान पक्षियों पर प्रसिद्द अध्ययन किया। अधिकतर कैदी वे थे जिन्होंने दूसरी जेलों में रहने के दौरान समस्याएं पैदा कीं , भागने के प्रयास किये ।
संघ की जेल से भागने के 14 प्रयासों में से सबसे चर्चित प्रयास 1962 में हुआ। फ्रैंक मॉरिस और एग्लिन बन्धुओं ने जेल से भागने के लिए पानी में उतर गए। उन्होंने अपने रेनकोट को तैरने के उपाय के रूप में प्रयोग किया। हालांकि उनका कोई अता-पता नहीं चला और यह माना जाता है कि भागने के प्रयास में वे डूब गए।
जेल के बारे में रहस्य और रोमांच के किस्से प्रचलित होने का कारण यह रहा कि यहां बाहर से आये लोगों को चट्टान के आगे आने नहीं दिया जाता था। इसी कारण यहां की कठिनाइयों और रहने की दुर्गंमता के किस्से फैले। इनमें से कुछ सही थे लेकिन यहाँ जेल साफ सुथरी थी और खाना अच्छा था।।निस्संदेह यह जेल सबसे सुरक्षित जेलों में से एक थी।
रखरखाव की बढ़ती कीमत के चलते 1963 में अमेरिका के अटॉर्नी जरनल रॉबर्ट एफ कैनेडी ने इस जेल को बंद करने का निर्णय लिया। सारे कैदी यहां से दूसरी जेलों में भेज दिए गए।
इतनी चर्चित जेल भी कोई खचाखच भरी नहीं रही।
जेल में कुल 336 बैरक थीं लेकिन कभी भी जेल पूरी भरी नहीं। अधिकतम 302 कैदी यहां रहे। कैदियों की औसत संख्या 260 रही। जेल में किसी को फांसी नहीं हुई। जेल में पांच आत्महत्याएं और आठ हत्याएं हुईं। आमतौर ओर कैदी यहां आठ से दस साल रहे।
जेल में कोई भी महिला कैदी या महिला वार्डन नहीं रही। संघ की जेल के समय के दरम्यान वहां रहने वाले परिवार अपने दरवाजों पर आमतौर पर ताले नहीं लगाते थे।
जिस जगह समाज की आधी आबादी महिला या पुरुष न रहे वह अपने में एक कैद ही तो है। कष्टकारी, दुर्गम जेल।
ताले भले न लगें लेकिन निर्जन और एकांत और उसके साथ कहीं आने-जाने की सुविधा या आजादी न होना अपने आप में एक जेल है। अपने लोगों से दूर रहना किसी सजा से कम थोड़ी होता है।

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Tuesday, November 09, 2021

अलकाट्राज का किला



द्वीप पर उतरते ही सामने खूब खुला-खुला मैदान गलियारे जैसा इलाका दिखा जैसा आमतौर पर किलों में दिखता है। सामने ही बड़ी पानी की टँकी और लाइटहाउस दिखता है। हर इमारत अपने में खास और कुछ विशेष इतिहास की गवाह। हम बारी-बारी से उन इमारतों की संगत में इतिहास के साथ जुड़ते रहे।
अलकाट्राज की प्रसिद्धि एक जेल के रूप में ज्यादा है लेकिन शुरुआती दौर में यह एक किले के रूप में विकसित हुआ। हजारों साल तक यह एक निर्जन द्वीप रहा। स्थानीय समुदायों के लोग यहां कभी-कभी आते रहे। लोग यहां पक्षियों के अंडों और मछली पकड़ने के लिहाज से आते रहे।
सबसे शुरू में स्पेनिश घुमक्कड़ खोजी जुआन मैनुएल दि आयला 1775 में यहां आए और इस द्वीप का नामकरण किया। इसके बाद स्पेनिश लोग इस इलाके में बसने लगे। फिर मेक्सिकन लोगों ने यहां डेरा डाला। कैलिफोर्निया के अंतिम मेक्सिकन गर्वनर पियो पिको ने यहां एक लाइटहाउस की योजना बनाई। लेकिन जब तक वह अपनी योजना को अंजाम दे पाता तब तक इस पर अमेरिकन लोगों का कब्जा हो गया। 1847 में कैलिफोर्निया के मिलिट्री गवर्नर इसे मैक्सिकन सरकार से अमेरिका के लिए खरीद लिया।
अमेरिका पर कब्जे के बाद यहां सोने की खानों का पता चला। इसके बाद तो यहां आने वालों की तादाद में बेतहाशा इजाफा हुआ। सोने की खानों से होने वाली आमदनी से यहां आने वाले जहाजों की संख्या बढ़ गयी। सैनफ्रांसिस्को की आबादी में भी बढ़ोत्तरी हुई। 1849 तक 300 उनींदे लोगों का शहर सैनफ्रांसिस्को, 20000 गन्दे और चमकते हुए नागरिकों का शहर बन गया।
1846 में इस द्वीप की सुरक्षा के लिहाज से यहां एक लाइटहाउस और किले का विचार बना। 1850 में सैनफ्रांसिस्को की सुरक्षा के लिहाज से गोल्डन गेट के दोनों तरफ दो किले और एक छोटा किला अलकाट्राज में बनाये जाने का विचार बना। 1853 में किला बनने की शुरुआत हो भी गई। 1854 में पहले लाइटहाउस की शुरुआत हुई।
लाइटहाउस में रोशनी के लिए पहले मिट्टी का तेल , फिर डीजल/पेट्रोल और बाद में बिजली का उपयोग होता रहा। रोशनी के लिए बिजली के प्रयोग के पहले लाइटहाउस का इंतजाम देखने वाले लाइटहाउस के पास ही घरों में रहते थे। ऊंचे लाइटहाउस में चढ़कर इसके लैम्प को साफ करते थे और उसमें तेल भरकर रखते थे ताकि लाइटहाउस अपना काम करता रहे। 1963 में यहां की जेल के बन्द होने के बाद लाइटहाउस आटोमेटिक हो गया। इसकी देखभाल अमेरिका कोस्ट गार्ड करता है।
1861 में अमेरिका में गृह युध्द छिड़ गया। चार साल चला। शहर और बंदरगाह आर्थिक रूप से समृध्द होने के कारण यहां होने वाले हमले बढ़ गए। एक समय इस किले की रक्षा के लिए द्वीप पर 111 गने थीं। चार सौ से अधिक सैनिक इसकी सुरक्षा के लिए तैनात थे। 1864 में किले की रक्षा के लिए 25 टन वजन वाली रोडमैन तोपें लगाई गईं। ये तोपें 15 इंच और 440 पाउंड के गोले तीन मील दूर तक फेंक सकतीं थीं।
गृह युध्द के दौरान मिलिट्री तकनीकी बहुत तेजी से बदली। सुधार के बावजूद अलकाट्राज का रक्षण पुराना और खर्चीला होता चला गया। अंततः 1907 में अमरीकन सेना ने किले के रूप में अलकाट्रांज को खारिज कर दिया। बाद के दिनों में इसका उपयोग एक जेल के रूप में हुआ।
द्वीप पर पानी की टँकी यहां का मुख्य आकर्षण है। इसके साथ कई किस्से भी जुड़े हैं। यहां खुद का पानी तो था नहीं। शुरुआती दौर में पीने और दीगर कामों के लिए पानी फेरी से लाया जाता था। पानी को छत पर बनी टँकी में रखा जाता था। 1940-41में पानी की टँकी बनी। 29 मीटर ऊंची पानी की टँकी इस द्वीप की सबसे ऊंची इमारत है। इस टँकी में पीने, आग बुझाने और धुलाई के लिए पानी इकट्ठा किया जाता था।
गृह युध्द के बाद यह पानी की टँकी स्थानीय लोगों के विद्रोह के प्रतीक के रूप में उभरी। नवबंर 1969 से जून 1971 तक इस द्वीप पर 89 अमेरिकी स्थानीय लोगों का कब्जा रहा। रिचर्ड ऑक्स , लनादा मीन्स और अन्य लोगों की अगुआई में 19 महीने तक अपने कब्जे के दौरान इस टँकी को स्थानीय लोगों ने प्रतिरोध के नारे लिखने के लिए उपयोग किया।
बाद के दिनों में समुद्री हवाओ के खारेपन के कारण टँकी जंग लगने के कारण कमजोर होती गयी। 2017 में इसको फिर से मज़बूत किया गया।
पानी की टँकी के बाद हम अंदर के हिस्से की तरफ गए जहां कभी दुर्गम अलकाट्राज जेल थी।

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Monday, November 08, 2021

सैनफ्रांसिस्को से अलकाट्राज़



“आप भोजन, वस्त्र, आश्रय और चिकित्सा देखभाल के हकदार हैं। इसके अलावा आपको जो कुछ भी मिलता है वह एक विशेषाधिकार है।“
यह नियम दुनिया की सबसे चर्चित जेलों में एक अमेरिका की अलकाट्राज़ जेल नियम था| अमेरिका के अंधेरे पक्ष के प्रतीक, अलकाट्राज़ जेल के बारे में, अनेक मिथकीय और सच्ची कहानियां जुड़ी रही हैं| ये कहानियां जेल और जेल में रहने वाले लोगों के बारे में हैं| इन लोगों में अल स्कारफेस , कैपोने और राबर्ट स्ट्राउड, जिनको अलकाट्राज़ में पक्षियों की देखभाल के चलते ‘वर्डमैन आफ अलकाट्राज़’ के नाम से जाना गया, शामिल थे|
अमेरिका में आए हमको 15 दिन हो चुके थे (19 नवम्बर, 2019 को)इन 15 दिनों में हम न्यूयार्क में उतरकर पूरा अमेरिका नापते हुए सैनफ्रांसिस्को पहुंचे| इस बीच अमेरिका के सात प्रदेश न्यूयार्क, न्यूजर्सी, फिलाडेल्फिया, वाशिंगटन डीसी, वर्जीनिया, ओरेगन और बैन्कोवर के प्रमुख स्थल दौड़ते-भागते, ढैया छूने वाले अंदाज में देखे| न्यूयार्क के बाद अब सैनफ्रांसिस्को को थोड़ा तसल्ली से देखने का मौका मिल रहा था| इस मौके को पूरा लूटने के मूड में थे हम| पूरी तसल्ली से घुमाई हो रही थी|
इसी सिलसिले में एक दिन ‘अलकाट्राज़ दर्शन’ का प्लान बना| सैनफ्रांसिस्को से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित अलकाट्राज़ एक निर्जन द्वीप, किला, दुनिया की दुर्गमतम जेल होते हुए अब अमेरिका के प्रमुख पर्यटन स्थल में शामिल है|
अलकाट्राज लिखने और बोलने की कोशिश करते हैं तो फौरन 'अलकतरा' याद आता है। वही लिखा भी जाता है। साथ ही याद आता है अपने यहां का प्रसिद्ध 'अलकतरा घोटाला'। अलकतरा मतलब तारकोल या कोलतार। काले रंग का सड़क बनाने का सामान। अलकाट्राज से भी अमेरिका के कई अंधेरे पक्ष जुड़े हैं।
अलकाट्राज़ सैनफ्रांसिस्को से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर है- समुद्र के रास्ते| पियर-33 से ‘अलकाट्राज़ क्रूज’ दिन में कई बार फेरी लगाता है| 15-20 मिनट का समय लगता है| सुबह की पहली फेरी में ही हम लपक के बैठ गए| हम मतलब मैं, पत्नी और बेटा सौमित्र|
फेरी खुली तो क्रूज हल्के झटके से चल दिया| बाएं किनारे पर गोल्डन गेट ब्रिज दूर से हमको मुस्कराता हुआ देख रहा था| पुल के नीचे खंभों में पानी उछाल मारते हुए खंभों को चूम-चूम कर वापस समुद्र में जमा होता जा रहा था| नीचे जमा होता पानी झाग के रूप में खंभे के पास झूमर डांस सा करते हुए, लहराते हुए आगे चलता जा रहा था| पानी की कोई लहर इतनी तेजी से पुल के खंभे की ओर दौड़ती हुई जाती कि लगता खंभे को निपटा के ही मानेगी| लेकिन पास पहुंचकर वह लहर भी खंभे के गले लिपटकर इठलाने लगती| क्या पता पुल के खंभे गाना भी गाते हों :
हम तुम पर इतना डाइंग,
जितना सी में पानी लाइंग|
समुद्र में पानी से याद आया , आपको भी बताते चलें| अलकाट्राज जेल दुनिया की दुर्गमतम जेलों में से मानी जाती थी| पूरे अमेरिका भर के छँटे हुए कैदी और दूसरी जेलों में हुड़दंग करने वाले कैदी यहां लाए जाते थे| समुद्र की तेज लहरों और बहुत ठंडे पानी के चलते यहां समुद्र के रास्ते भागना भी बहुत कठिन काम था| लेकिन जेल के सारे सुरक्षा बंदोबस्त को धता बताते हुए जून 1962 को क्लेरेन्स एंग्लिन , जान एंग्लिन और फ्रैंक मोरिश नाम के कैदी जेल से भाग निकले| समुद्र के रास्ते जमीन पर पहुंचने के प्रयास में| उनके भागने की खबर से हड़कंप मच गया| सैकड़ों लोग खोज में लगे| अनेक किस्से बने, फिल्में भी बनी| लेकिन एंग्लिन बंधु और मोरिश नहीं मिले तो नहीं ही मिले| अनुमान लगाया जाता है कि बर्फीले समुद्र के पानी में वे निपट गए| वहीं तमाम लोग उनके बच निकलने की कहानियाँ सुनाते हैं| वे बचे के निपट गए यह तो खुदा जाने लेकिन आज भी अमेरिकी मार्शल सेवा में आज भी इनकी फ़ाइल बंद नहीं हुई है और इन तीनों के नाम ‘वांटेड’ की लिस्ट में हैं|
खैर जेल से भागने वालों का क्या हुआ उसके बारे में बात करने से कोई फायदा नहीं| उलटे खतरा ही है| क्या पता कोई हमको भी पूछताछ के लिए हमको बुला ले –बताओ एंग्लिन बंधु और मोरिश कैसे भागे ? हम कितना भी कहते रहें कि मालिक, हमारी पैदाइश तो 1962 के बाद की है वे हमारे अवतरण से पहले ही भाग चुके थे| लेकिन लोग एकबार पूछताछ करने के लिए बुलाएंगे तो मानेंगे थोड़ी| पूछ के ही मानेंगे| पूछने पर उतर आयें तो न जाने क्या-क्या पूछने लगें? हमारा मोबाइल धरवा लें| हम कहीं फोन करने को तरस जाएँ| कहीं बुराई-भलाई भी न कर पाएं| जीवन निस्सार हो जाए| इसलिए जेल से भागने वालों के बारे में कोई बात नहीं | सीधे वापस चलते हैं क्रूज पर|
क्रूज पर अधिकतर लोग डेक पर बैठे समुद्र का नजारा ले रहे थे| फ़ोटो ले रहे थे| कुछ लोग शांत भाव से बेंचों पर बैठे थे| तेज हवा चल रही थी| धूप हालांकि पूरी खिली थी लेकिन मौसम सर्द था| ऊपर एक हेली काप्टर चक्कर मार रहा था| क्या पता ड्रोन की तरह हम पर निगाह रखने के लिहाज से यह इंतजाम किया गया हो|
क्रूज को चलाने के लिए भले तेल का उपयोग किया जा रहा हो लेकिन उसकी रोशनी , आडियो, डिस्प्ले और डेक सिस्टम के उपकरणों को चलाने के लिए आवश्यक बिजली के उत्पादन के लिए वायु ऊर्जा या सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा था|
बहरहाल जल्द ही क्रूज किनारे लगा| जहाज में मौजूद कामगारों ने फटाफट क्रूज को मोटे रस्से के सहारे किनारे लगे खंभों से बांधा| इन कामगारों में अधिकतर महिलायें थीं| क्रूज किनारे ठहरकर सुस्ताने लगा| हम लोग धड़ाधड़ उतरने के लिए लपके लेकिन फिर याद आया यहां सब काम लाइन में लगाकर होता है| हम ठहर गए| तसल्ली से लाइन में लगकर नीचे उतरे|
क्रूज से उतरकर हमने भरपूर अंगड़ाई ली| सामने अलकाट्राज़ हमारे स्वागत में मुस्करा रहा था| हम भी मुस्करा दिए| मुस्कराने के बाद हम अलकाट्राज़ को देखने चल दिए| अलकाट्राज़ जो कि कभी एक किला था, एक जेल था, स्थानीय लोगों की अभिव्यक्ति एवं आजादी का स्मारक था और इन सब यादगारों को समेटे हुए एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल था|

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Saturday, November 06, 2021

दीवाली के बहाने इधर-उधर की



दीवाली आकर गुजर गई। चार दिन की छुट्टी आधी से ज्यादा खर्च हो गयी। तमाम काम करने के बारे में सोचा था लेकिन अमल में कौन लाता है। सोचा था कि अमेरिका के बचे हुए संस्मरण लिखकर किताब बन जाएगी। लेकिन दो साल पहले के बचे किस्से जब भी लिखने की सोचते हैं , वो सब हाथ से फिसल जाते हैं।
लिखने का हरेक का अलग-अलग अंदाज होता है। कई लोग तसल्ली से लिखना पसन्द करते हैं। हमसे तसल्ली वाला लेखन नहीं हो पाता। आज का किस्सा आज नहीं लिखा तो वो तासीर नहीं बचती। लगता है कमजोर हो गया संस्मरण। दुबला गया बेचारा। किसी घटना से रूबरू होते हुए जो बिम्ब उभरते हैं वो समय के साथ बिखर जाते हैं। लिखने का मन नहीं होता।
हमारे तमाम अधूरे लेख अक्सर हमको और हमारी बेतरतीबी को कोसते हुए कहते होंगे -'इस नामुराद की काहिली के चलते हम अधूरे पड़े हैं। वरना हम भी मुक्कमल होकर किसी लेख की शक्ल पा गए होते।'
लिखने की तो हम यह भी सोचते हैं कि एक ठो उपन्यास लिखा जाए। उपन्यास लिखने का हमारा बहुत मन है। भले ही घटिया ही लिखें। घटिया भले ही कोई कहे, लेकिन उपन्यास कहने से कोई थोड़ी रोक सकेगा उसे। घटिया भी केवल वही लोग कहेंगे, जो उसे पढेंगें। बाकी लोग थोड़ी कुछ कहेंगे। पढेंगे ही नहीं तो जानेंगे कैसे कि घटिया है। दस-बीस लोगों के कहने से क्या होता है। हम इत्ती फिजा बना देंगे लिखते ही कि कोई भी शरीफ इंसान इसके खिलाफ कुछ कहने से बचेगा। जो कोई आलोचना करेगा हम उससे कहेंगे -'आप इसको अभी समझे नहीं, यह अपने समय से आगे का उपन्यास है।'
'आप इसे समझे नहीं' कहकर तमाम लोग अपने साधारण लेखन को ऊंचा बताते रहते हैं। लेकिन यह हुनर हमको अभी आता नहीं। हमारी तो किसी रचना की कोई तारीफ भी करता है तो हमको लगता है, अगला हमको बेवकूफ बना रहा है। हमारे चिरकुट लेखन को अच्छा बता रहा है।
इस बीच घूमना-फिरना भी स्थगित रहा। रोज सोचते हैं सुबह निकलेंगे। सुबह सोचते हैं , शाम को चलेंगे। सुबह-शाम के चक्कर में सब स्थगित हो जाता है। घूमते हुए लोग मिलते हैं, उनसे बातें होती हैं तो तमाम ख्याल आते हैं। उनको तुरन्त न लिखा जाए तो सब नाराज होकर दिमाग से बाहर चले चले जाते हैं।
दीवाली को घर खूब सजाया गया। मार झालर-फालर लगाई गई। चीनी सामान का कितना बहिष्कार हुआ पता नहीं लेकिन हमारे यहां चीनी झालर ही लगी। पूरे घर में जलती-बुझती झालर को देखकर लगा मानो झालर के मन में धुकुर-पुकुर मची है कि कहीं अगली घड़ी फ्यूज न हो जाऊं। एक दिन बाद एक हिस्से ने फ्यूज होकर अपना चीनी होना सार्थक भी कर दिया। लेकिन बाकी हिस्सों ने फ्यूज न होकर चीन की नाक कटा दी। ऐसी भी क्या चीनी झालर जो भला फ्यूज न हो।
रोशनी से घर जगमग हुआ तब तो नहीं लेकिन आज हम सोच रहे हैं कि देश भर में बिजली का संकट था। कोयला एक-दो दिन का ही बचा था। इसके बावजूद हमने बिजली की झालर लगाई। कितनी खराब बात। कितनी भी कम बिजली लगती हो लेकिन ख़र्च तो फिजूल का ही है। गाते भले नीरज जी की कविता हों :
'जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना,
अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाये।'
लेकिन अमल में कविता से उलट काम कर रहे। जितने की झालर हमने लगाई उतने के लिए जो बिजली चाहिए होगी उसमें दस-बीस किलो कोयला तो फुंका होगा। कोयला जला होगा, तो उससे कार्बन डाई ऑक्साइड भी बनी होगी। उस कार्बन डाई आक्साइड से दुनिया का तापमान कुछ तो बढ़ा होगा। मतलब दुनिया के पर्यावरण को बिगाड़ने में अपन का भी दोष रहा होगा। सामूहिक अपराध में शामिल हो गए अपन भी। सजा भी मिलेगी ही। धरती गर्म होकर हमको सजा देगी।
दीवाली की रात घूमने निकले। लोग बेंचों पर बैठे बतिया रहे थे। एक जगह कुछ युवा ठहाके लगाते हुए स्कूली दिनों के किस्से साझा कर रहे थे। एक ने किसी कन्या का नाम लेते हुए बताया -'सब समझते थे कि वो उनको लिफ्ट देती थी लेकिन उसने किसी को भाव नहीं दिया।' इसी घराने की बातें । बातें और भी लेकिन उनको बताना उनकी निजता का हनन होगा।
सड़क पर कुछ गायें बैठीं थीं। सपरिवार। तसल्ली से। बीच सड़क पर। कोई उनको टोंकने वाला नहीं था। एक जीप निकली तो उनकी रोशनी में गायें चमक गयीं। हमने भी उसी समय फोटो खींच ली। बिना उनसे पूंछे। पूछते तो भी मना थोड़ी करतीं।
घर वापस आकर घर के बाहर का वीडियो बनाया। बगीचे का फव्वारा भी चला लिया। वीडियो देखकर तमाम लोगों ने घर की तारीफ भी की। तो सोचा आपको भी दिखा दिया जाए। देखिए।
हमारी तो दीवाली गुजर गई। आपकी भी गुजर ही गयी होगी। अच्छी ही गुजरी होगी। ऐसे ही सब कुछ अच्छा गुजरता रहा। बाकी और कुछ रखा नहीं है दुनिया में।

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Thursday, November 04, 2021

उजालों के गीत बहुत गाये गये!


जरा सा जुगनू भी चमकने लगता है अंधेरे में,
ये अंधेरे का बड़प्पन नहीं है तो और क्या है जी!
कम रोशनी ज्यादा उजाले से भन्नाई रहती है,
अंधेरों में आपस में कोई दुश्मनी नहीं हो्ती।
आज उजालों के गीत बहुत गाये गये!
इसी बहाने गरीब अंधेरे निपटाये गये।
अंधेरे ने रोशनी से जरा सी छेड़छाड़ की,
उजाले ने रपटा लिया उसे बहुत दूर तक!
असल में अंधेरे की अपनी कोई औकात नहीं होती,
इसकी पैदाइश तो उजालों में जूतालात से होती है।
-कट्टा कानपुरी

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Tuesday, October 26, 2021

सब कुछ लिख दिया जाने के बाद भी

 सब कुछ लिख दिया जाने के बाद भी,
बहुत कुछ लिखने को बचा रह जाता है।

हम बिस्कुट भिगो के चाय में खाते ही नहीं,
इसीलिये वो नामुराद डूबने से बच जाता है।
ऊंची बात कहने वाले तो कई होंगे यार,
अपन का तो रोजमर्रा की बातों से नाता है।
-कट्टा कानपुरी

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Sunday, October 24, 2021

उजाले की सरकार

 कमरे में बैठे हुए सूरज की किरणों को देख रहा हूँ। स्कूल के दिनों से पढ़ते आये हैं कि सूरज की सतह से चलकर पृथ्वी तक पहुंचने में आठ मिनट लगते हैं किरणों को। धरती पर पहुंचने के पहले लाखों किलोमीटर चलना पड़ता है किरणों को। रास्ते में भयंकर वाला अँधेरा पड़ता होगा। कहीं कोई इंतजाम नहीं रौशनी का। पता नहीं किसकी सरकार है सूरज और धरती के बीच जो करोड़ों वर्षों में दो चार ठो बिजली के पोल तक न गड़वा पाई अपने इलाके में।

बाहर अशोक का पेड़ नुकीला एकदम भाले की तरह खड़ा है। ऐसे लग रहा है बड़ा होकर आसमान के पेट में छेद करके ही मानेगा पट्ठा।
कुछ देर पहले पूरे लान में जहाँ कोहरे का कब्जा था वहां अब उजाले की सरकार है। मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमन्त्री, राज्यपाल, सन्तरी,कलट्टर सब पदों पर सूरज के खानदान के लोगों का कब्जा है। किसी के पास कोई डिग्री नहीं है। किसी ने शपथग्रहण में समय बरबाद नहीं किया। किसी ने आने के पहले हल्ला नहीं मचाया कि मित्रों हम आते ही अँधेरे और कोहरे को उखाड़ फेकेंगे। किसी ने विज्ञापन में न समय खराब किया और न पैसे फूंके। बस आये और चुपचाप लग गए काम में। जहां कुछ देर पहले अँधेरा था वहां अब उजियारा है।
कमरे का दरवाजा खुला हुआ है। सूरज की किरणें दरवज्जे से अंदर कमरे में दाखिल हो गयी हैं। वो एक दायरे में ही रुक गयी हैं। उजाला आगे अंदर घुस आया है और जगह-जगह फैलता जा रहा है। अंदर जहाँ भी अँधेरा था वहां अब प्रकाश दिखने लगा है। लगता है सूरज के निकलते ही अँधेरे ने कुछ देर तो उजियारे से कुश्ती की होगी। फिर अपनी औकात समझकर उजाले के सामने समर्पण कर दिया होगा।
सूरज और धरती आपस में आठ मिनट की दूरी पर हैं। दोनों में आपस में क्या कभी बात होती होगी? अगर हाँ तो कौन कम्पनी का फोन प्रयोग करते होंगे दोनों। हो सकता है कि ये जो किरणें हैं न वही माध्यम हों दोनों के आपस में बतियाने का। ये जो सूरज की किरणें बीच-बीच में मुस्कराती और खिलखिलाती सी दिखती हैं वो शायद दोनों की बातें सुनकर ही ऐसा करती हों।
क्या पता दोनों आपस में बतियाते हुए मजे लेते हों एक दूसरे से। सूरज भाई धरती से कहतें हों कि तुम काहे को चक्कर लगाती रहती हो मेरे। आ जाओ मेरे ही पास। बहुत जगह खाली पड़ी है इधर। रहो आराम से। तुम्हारे लिए रोज-रोज रौशनी भेजने का लफ़ड़ा कम होगा।
धरती शायद कहती हो -अरे रहन दो पास होने की बात। इत्ता तो सुलगते रहते हो। तुमसे तो दूरी ही भली। तुम्हारा तो सबसे कम टेंपरेचर ही 6000 डिग्री है। इत्ते में तो हमारे सबरे बाल-बच्चे, प्राणी, जानवर सुलगकर राख बन जाएंगे। सारी हरियाली जल जायेगी, नदियां गायब हो जाएंगी, समन्दर गोल। हमारा धरतीपन खत्म हो जायेगा। हमें न आना तुम्हारे पास।
धरती को सूरज चक्कर वाली बात लगता है ज्यादा ही लग गयी। इसीलिये वो अलग से बोली--'जहां तक रही चक्कर की बात तो जिस दिन हम चक्कर लगाना छोड़ देंगे तो ये जो तुम्हारा सौरमण्डल का टीम टामड़ा है न यह सब लड़खड़ा जाएगा। क्या पता फिर तुम भी कहीँ लड़खड़ाते हुए किसी दूसरे सौरमण्डल में शरण मांगो जाकर। ये हमारा तुम्हारे चारो तरफ घूमना जितना हमारे लिए जरूरी है उतना ही तुम्हारे लिए भी। सो इसका ज्यादा गुमान न किया करो कि हम तुम्हारे चक्कर लगाते हैं।'
सूरज भाई को लगा कि धरती कुछ ज्यादा ही गरम हो गयी सो मुस्कराते हुये बोले-'अरे मैं तो मजाक कर रहा था। तुम तो बुरा मान गयी। कितना अच्छी लग रही हो तुम स्वीट एन्ड क्यूट गोल-गोल घूमती चक्कर लगाती हुई।'
कोई फेसबुकिया होता तो इतने पर खुश होकर सूरज भाई को थॅंक्यू बोलकर चार ठो इस्माइली अलग से लगाता लेकिन चूंकि धरती का कोई फेसबुक खाता तो है नहीं सो उसने सूरज की 'चक्कर लगाती हुई' वाली बात पकड़ ली और फिर हड़काया-' मैं तो सिर्फ तुम्हारा चक्कर लगाती हूँ वह भी अपने बाल-बच्चों के लिए। रौशनी के लिए। लेकिन तुमको कौन जरुरत है जो तुम आकाश गंगा के चक्कर लगाते रहते हो। तुम्हारे पास तो खुद की रौशनी है। ज्यादा मुंह मती खुलवाओ मेरा अब सुबह-सुबह। हमको अपना काम करने दो।'
सूरज भाई चुपचाप मुस्कराते हुए एक बादल की ओट में चले गए। ऊपर से धरती को अपनी धुरी पर घुमते देखते रहे। दोनों अपने अपने काम में लग गए।
हम भी चलते हैं अपने काम पर। आप भी मस्त रहिये।

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Saturday, October 23, 2021

लिफाफे में कविता



*मंच के कवि को अपमान की परवाह नहीं करनी चाहिए। यदि आप स्वाभिमान के चक्कर में पड़े तो हाथ धो बैठेंगे।
*मंचीय कवि के लिए सबसे बड़ा पैसा होता है। वह पैसे के अलावा किसी के आगे नहीं झुकता। पैसे के आगे वह अपना परिवार, मित्र, गांव-जवार, सिद्धांत आदि छोड़ देता है।
ऊपर के पंच वाक्य Arvind Tiwari जी के एकदम ताजा उपन्यास 'लिफाफे में कविता' से हैं। उपन्यास मंचीय कवियों की पोल-पट्टी खोलने वाला है। इसमें अरविंद जी के अनुभव सुने-सुनाए और प्रत्यक्ष दोनों तरह के होंगे।
192 पेज के उपन्यास में से 68 पेज सुबह की सिटिंग में पढ़ गए। उपन्यास की पठनीयता और रोचकता का प्रमाण है यह।
फिलहाल इतना ही। बकिया पूरा पढ़कर लिखेंगे। पढ़ तो आज ही लेंगे। लिखेंगे भी जल्दी ही।
आप भी मंगा लीजिए उपन्यास। पढ़ने लायक है। पसन्द न आये तो पढ़कर या अधपढा हमको आधे दाम पर दे दीजियेगा। हम।मित्रों को उपहार के रूप में दे देंगे।
राज की बात यह भी कि उपन्यास का नामकरण वरिष्ठ व्यंग्यकार के नाम से विख्यात होने के बाद एकरिंग के अखाड़े में 'उछल-उछलकर' हाथ आजमाने के लिए कूदे Alok Puranik ने किया था। लेकिन अरविंद जी कवि सम्मलनों की हालिया दुर्गति से इतना ज्यादा भन्नाए हुए लगे 'अपनी बात' में कि इसका जिक्र करना भूल गए। यह उसी तरह हुआ जैसे कवि सम्मलेन का आयोजक कवियों से कविता पढ़वा कर पारिश्रमिक देना भूल जाता है। 🙂
किताब पढ़ते हुए अरविंद जी के पिछले उपन्यास शेष' अगले अंक में' , 'हेड ऑफिस के गिरगिट' और 'दिया तले अंधेरा' भी याद आये। इन उपन्यासों का जितना जिक्र होना चाहिए उतना शायद हुआ नहीं। अरविंद तिवारी जी को आत्मविज्ञापन भी सीखना चाहिए। लेकिन यह गुण आदतन होता है, सीखा नहीं जाता।
बहरहाल फिलहाल ' लिफाफे में कविता' का आनन्द ले रहे हैं अपन। आप भी लीजिए। मजा आएगा।
खरीद का लिंक टिप्पणी में देखें।

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Thursday, October 21, 2021

आत्मबोध



यह सब कुछ मेरी आंखों के सामने हुआ!
आसमान टूटा,
उस पर टंके हुये
ख्वाबों के सलमे-सितारे
बिखरे.
देखते-देखते दूब के दलों का रंग
पीला पड़ गया
फूलों का गुच्छा सूख कर खरखराया.
और ,यह सब कुछ मैं ही था
यह मैं
बहुत देर बाद जान पाया.
- कन्हैयालाल नन्दन

कविता सुनने की कड़ी : https://www.youtube.com/watch?v=SnBXex5flFs

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करेंट बुक डिपो



कानपुर में जब भी 'करेंट बुक डिपो' के पास से कभी भी गुजरते हैं तो अनायास 'दुकान-दाखिल' हो ही जाते हैं। यहां आने का हासिल यह होता है कि लौटते हुए कोई न कोई किताब साथ हो लेती है। वह किताब कोई नई किताब हो सकती है या फिर पिछली बार साथ ले जाने से स्थगित रह गयी कोई किताब। साहित्यिक पुस्तकों के मौजूदगी का विश्वनीय अड्डा है 'करेंट बुक डिपो'।
आज किताबें आन लाइन मंगाने का चलन बढ़ गया है। डिजिटल डाउनलोडिंग भी होने लगी है जिसमें 100 रुपये की किताब 10 रुपये में डाइनलोडिंग करके पढ़ी जा सकती है लेकिन डिजिटल मोड में किताब पढ़ने और छपी हुई किताब हाथ में लेकर पढ़ने की क्या तुलना? दोनों की तुलना करने को कहा जाए तो अनायास निकलता है -' जो मजा बनारस में, वो न पेरिस में न फारस में।'
ऑनलाइन खरीदी और डिजिटली पढ़ाई के दौर में किताबों की बिक्री का धंधा मंदा होता गया है। किताबों की दुकानों पर लोगों की आमद कम हो गयी है। पहले टीवी और मोबाइल के चलते किताबें पढ़ने वाले भयंकर तेजी से कम होते जा रहे हैं। ऐसे कठिन दौर में भी 'करेंट बुक डिपो' जैसे संस्थानों का बचे रहना और चलते रहना अपने में बहुत सुकून की बात है।
'करेंट बुक डिपो' की शुरुआत जिस उद्देश्य और भावना से इसके संस्थापक स्व. महादेव खेतान जी ने की थी वे उद्धेश्य और भाव आज के समय में अल्पसंख्यक और खतरे की स्थिति में भी हैं। इसके बावजूद जिस समपर्ण भाव से महादेव खेतान जी के सुपुत्र अनिल खेतान जी इसका संचालन कर रहे हैं वह अपने में सुकून और सराहना की बात है। अनिल जी शहर में पुस्तक मेला के संचालन के भी प्रमुख सूत्रधार हैं।
कल जब फिर करेंट बुक डिपो के पास से गुजरे तो बहुत व्यस्त होने के बावजूद दुकान जाने का मोह संवरण न हो सका। कुछ किताबें जो दिखीं वो फौरन ले लीं। बाकी फिर अगली बार के लिए स्थगित कर दीं। तमाम किताबें हमसे निर्लिप्त शेल्फ पर बैठी रहीं। कुछ उलाहना सी देती लगीं -'हम कब तक यहां रहेगीं।'
कल विदा होते समय Anil Khetan अनिल जी ने Veeru Sonker वीरू सोनकर की कविताओं और उनके तेवर की तारीफ की तो उनकी भी किताब ले ली। उनकी फेसबुक वॉल पर उनके स्टेटस पढ़े। अच्छे लगे। नौजवान तेवर, कनपुरिया होने के चलते कहना होगा - 'झाड़े रहो कलक्टरगंज।'
कानपुर में हैं और किताबों के प्रेमी हैं और अभी तक 'करेंट बुक डिपो' नहीं गए हैं तो समझिए एक जरुरी जगह नहीं गये हैं। फौरन पहुँचिये, आनन्द आएगा।

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Tuesday, October 19, 2021

Monday, October 18, 2021

बारिश, रिक्शा स्टैंड और मोबाइल में डूबे लोग



कल बहुत दिन बाद साइकिलिंग को निकले। शाहजहांपुर साइकिलिंग क्लब के सूत्रधार, संस्थापक डॉक्टर विकास खुराना ने सूचना दी कि एक दिन में 75 किलोमीटर साइकिल चलाने वाले साथियों को मेडल देकर उनका उत्साह वर्धन करना है। समय तय हुआ शाम 5 बजे। जगह कैंट आर्मी गेट।
शाम होते- होते पानी बरसने लगा। पहले तेज फिर रुक-रुक कर। बाद में हमारी तरफ रुक गया लेकिन दूसरी जगहों पर बरसता रहा। आर्मी गेट हमारे घर से दो मिनट की दूरी पर है। लिहाजा हम तो फटाक से पहुंच गए। लेकिन दूर से आने वाले कई साथी आ नहीं पाए। सम्मानित किए जाने वालों में से भी एक बच्ची नहीं आ पाई। तय हुआ कि सम्मानित करने का कार्यक्रम अगले हफ्ते होगा।
डॉ विकास खुराना अपनी बिटिया अवन्या के साथ समय पर पहुंच गए थे। कुछ और साथी भी आ गए थे। अवन्या ने बताया कि उसका स्कूल फिर बन्द हो गया है, दशहरे के कारण। अब 20 को खुलेगा। अवन्या ने लम्बी साइकिलिंग की बात भी कही। 100 किमी के लिए चलने को फौरन तैयार हो गयी। बोली -'अभी चलते हैं।'
जितने लोग आ गए थे उनके साथ फोटो के बाद हमने एक चक्कर साइकिल चलाई। पानी फिर बरसने लगा था, लिहाजा एक चक्कर के बाद सब लोग घर लौट गए।
लौटते हुए रामलीला मैदान का चक्कर लगाते हुए आये। मैदान में एक दुबला-पतला घोड़ा सड़क की तरफ पीठ किये घास चर रहा था। थोड़ा सहमा सा, जल्दी-जल्दी घास खाते देखकर लगा उसको समझाएं कि हड़बड़ी नहीं करो, तसल्ली से खाओ। लेकिन फिर उसको डिस्टर्ब करना ठीक नहीं लगा।
घोड़े को हड़बड़ी में घास खाते देखकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में काम करने वाले युवाओं का ख्याल अनायास आ गया। ऐसा लगा जैसे दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद हड़बड़ी में अपना पेट भर रहा है। उपमा निहायत बेतुकी और शायद सच से परे भी है। कई बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में काम की जगह ही खाने का भी अच्छा इंतजाम होता है। लेकिन फिर भी ऐसी बात जेहन में घुस गई और निकली नहीं। दूसरों के बारे में हम अक्सर ऐसे ही बेसिर पैर की उपमाएं गढ़ लेते हैं। उपमाएं एक बार गढ़ ली जाती हैं तो ताजिंदगी जेहन से निकलती नहीं जबतक सच्चाई से सामना न हो जाये। और सच्चाई के बारे में तो आपको पता ही है कि कितना सहमती है आजकल सामने आने से।
मंदिर के पास कुछ गायें चौराहे पर खड़ीं दिखीं। बारिश में उनके बीच सड़क खड़े होने से ट्राफिक को समस्या होती है। लेकिन गायें को भी खड़े होने के लिए चौराहे ही रास आते हैं। समस्या अपनी जगह लेकिन गायों की बुराई करना ठीक नहीं। वो बुरा मानें या न माने उनकी चिंता करने वाले बुरा मान सकते हैं।
पानी तेज बरसने लगा तो सड़क किनारे रिक्शा स्टैंड पर बनी बेंचों पर बैठ गए। और लोग भी वहां आते गए, खड़े हो गए, बैठते गए। खड़े होते, बैठते ही लगभग सभी लोग मोबाइल निकालकर उसमें घुस गए। मोबाइल लोगों की शरण स्थली बना है। पुराने जमाने में लोग बचे हुए पैसे गुल्लक, सन्दूक में जमा कर देते थे यह सोचकर कि बख्त जरूरत काम आएगा। आजकल लोगों के पास जो भी समय बचता है उसे मोबाइल में डाल देते हैं। मोबाइल माने समय की गुल्लक। जो समय बचे उसे इसी में घुसा दो। अब लोगों को कौन समझाए कि समय कोई चिल्लर पैसा थोड़ी जो जमा करके बाद में उपयोग किया जा सके। वह गया तो गया।
लोगों की मौका मिलते ही मोबाइल में मुंडी घुसाने की आदत से दुष्यंत कुमार जी का शेर बदलकर पढ़वाने को जी चाहता है। अर्ज किया है:
लहू-लुहान नजारों का जिक्र आया तो,
शरीफ लोग उठे और मोबाइल में जाकर डूब गए।
लहूलुहान नजारों से हो सकता है कि आपको एतराज हो। लेकिन हमारी भी मजबूरी कि हम पूरा का पूरा शेर थोड़ी बदल देंगे। बदल देंगे तो फिर पढेंगा कौन इसे। वैसे सच यह भी है कि लहूलुहान नजारों की बात हो या कोई और हादसा , आजकल उनकी बात होने पर लोग मोबाइल में ही घुस जाते हैं।
सामने बैठा आदमी जोर-जोर से किसी का हाल पूछ रहा था। दूसरी तरफ के इंसान को हड़का रहा था कि परेशानी के दौर से अगला अकेले, बिना बताए, चुपचाप कैसे गुजर गया। उसको क्यों नहीं बताया। परेशानी गुजर जाने पर उसकी सूचना न देने के बारे में हड़काना लाजिमी है।
बगल में बैठा आदमी मोबाइल पर कैरम खेल रहा था। हमारे लिए ताज्जुब का विषय कि बताओ कैरम भी मोबाइल में आ गया। हमको ताज्जुब के तालाब में तैरता छोड़ अगला कैरम खेलता रहा।
देखते-देखते पानी तेज हो गया। हम भी मोबाइल देखने लगे। मुंडी झुकाए मोबाइल में घुसे ही थे कि एक भाई जी आये और झटके से हमारे चरण स्पर्श कर गए। हमको झटका लगा। अपन चरण स्पर्श करवाने में बहुत संकोची हैं। किसी को यथा सम्भव पैर नहीं छूने देते। बच्चों तक को नहीं। पैर छुआने में संकोच लगता है। लगता है हमारे पास ऐसा क्या है जो हम किसी से पैर छुआएं। पुण्य-गरीब हैं हम। पैर छूने की कोशिश करता हुआ इंसान हमको हमारा बचा-खुचा पुण्य लूटने की कोशिश करता लगता है। इसलिए हम बहुत सावधान रहते हैं, कोई पैर छूने की कोशिश करता है तो रोक देते हैं, टोंक देते हैं, बचा लेते हैं पैर।
हमको लगता है किसी चरण-स्पर्शातुर से अपने पैर बचाकर अपनी इज्जत बचा ली। कोई पैर छूने की कोशिश करता है तो लगता है इज्जत पर हमला कर रहा। कोई अचानक पैर छू लेता है तो लगता है इज्जत लूट गईं। इज्जत की जेब कट गई। दुनिया के तमाम गड़बड़ काम पैर छूने के बाद ही अंजाम किये जाते रहे हैं। गुरुओं के मठों, तख्तों पर कब्जा करने के पहले शातिर चेले उनके पैर छूते हैं। कत्ल करने के पहले कातिल द्वारा कत्ल करने वाले के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेने की कई नजीरे हैं।
तमाम सावधानी के बावजूद कभी कोई पैर छू ही लेता है। कभी झटके में और कभी जबरियन यह कहते हुए -'यह तो हमारा हक है।' 'यह तो हमारा हक है' कहकर दुनिया में तमाम अपराध होते रहते हैं। छंटे हुए अपराधी तक 'यह तो हमारा हक है' कहते हुए समाज सेवा के अखाड़े में कूदकर समाज की मिट्टी पलीद करते रहते हैं। अपने ही यहां अनगिनत माफिया जनता की सेवा करना अपना हक मानते हुए राजनीति में सक्रिय हैं। धड़ल्ले से जनता की सेवा कर रहे हैं। किस माई के लाल की हिम्मत कि उनकी सेवा से जनता की हिफाजत करे।
बहरहाल पैर अकेले में छुए गए थे इसलिए हम कुछ करने की स्थिति में थे नहीं। वैसे सबके सामने भी कोई छू लेता तो कौन एफ आई आर कराते।
बरसते पानी में भी लोग घर आ-जा रहे थे। कुछ साइकिल सवार बतियाते हुए निकले। मोटरसाइकिल धड़धड़ाते हुए। एक आदमी सड़क पर दुलकी चाल से दौड़ता हुआ आता दिखा। उसके दोनों पैर एक दूसरे का विरोध करने वाले अंदाज में साथ चलते दिखाई दिए ऐसे जैसे किसी पार्टी में दो विरोधी धड़े अपने वर्चस्व की कुश्ती लड़ते हुए साथ भी है और अलग भी।
पानी और तेज हो गया। एक ऑटो वाले ने मुझे पहचानकर घर तक पहुंचाने का ऑफर दिया। हमने साइकिल का हवाला देकर मना किया। उसने ऑफर में साइकिल भी ले चलने को कहा। हमने फिर मना किया और बारिश रुकने का इंतजार किया।
इस बीच एक और आदमी आ गया। आते ही उसने नमस्ते करके एक घपले का किस्सा सुना दिया। हमको लगा कि जानकारी के लिए लोगों से मिलना बहुत जरूरी है। सब कुछ डिजिटल डाटा के भरोसे छोड़ना ठीक नहीं। खुद के बारे में जानकारी के लिए दूसरों से मिलना जरूरी है। दूसरे जितना हमारे बारे में जानते हैं उतना हमको खुद पता नहीं होता।
वहीं एक बच्चा और मिला। पिता नहीं रहे। उसकी जगह भाई को नौकरी लगी। दूसरा दिहाड़ी मजदूर। खुद नौकरी के लिए इम्तहान दे रहा है। पता चला एक साल इंजीनियरिंग भी की। लेकिन इंटर में पढ़ाई का माध्यम हिंदी होने के चलते पहले साल तीन विषय में फेल हुए। बैक आ गई। इंजीनियरिंग छोड़कर घर आ गए। बी.ए. किया और अब नौकरी की तलाश कर रहे हैं। बीए और नौकरी के बहाने अकबर इलाहाबादी भी याद आ गए जो नौकरी पेशा लोगों के लिए कह गए हैं:
क्या किये एहबाब, क्या कार-ए-नुमाया कर गये,
बीए किया, नौकर हुए, पेंशन मिली फिर मर गए।
कुछ देर बाद बादलों का पानी का स्टॉक खत्म हो गया। कुछ बादल शायद रिचार्ज कराने चले गए। बाकी गरजने की ड्यूटी बजाते रहे। हम खरामा-खरामा पैडलियाते हुये घर आ गए।

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