Wednesday, October 09, 2024

फ़ेसबुक की सामुदायिक भावना

 कुछ दिन पहले एक लम्बी पोस्ट लिखी थी। एक बातचीत का विवरण देते हुए रपट लिखी थी

पोस्ट में मेहनत से फ़ोटो लगाए थे। उनके कैप्शन थे। वीडियो थे। लिखने में क़रीब चार- पाँच घंटे लगे थे। फ़ोटो लगाने, कैप्शन लिखने में भी आधा घंटा क़रीब लगा। संबंधित लोगों को टैग करने में भी समय लगा।
फ़ेसबुक ने पोस्ट कुछ देर बाद हटा दी। यह कहते हुए कि पोस्ट फ़ेसबुक की कम्यूनिटी भावना के विपरीत है।
कुछ देर बाद फिर पोस्ट की। फिर वही लिखते हुए पोस्ट हटा दी फ़ेसबुक ने।
हमने कुछ मित्रों से कारण पूछा। पोस्ट पढ़ चुकी Bhavna ने सुझाया कि पोस्ट में उपयोग किए शब्द 'प्रगतिशील' से फ़ेसबुक का हाज़मा ख़राब हुआ लगता है। 'प्रगति' और 'शील' को अलग-अलग करके देखिए। हमने किया। सब जगह 'प्रगति' शब्द को 'शील' शब्द से अलग कर दिया। दोनों के बीच गैप दे दिया। क़रीब 18 जगह 'प्रगति' और 'शील' में सम्बंध विच्छेद करना पड़ा।
इसके बाद पोस्ट प्रकाशित की तो फ़ेसबुक ने कोई एतराज नही किया। पोस्ट प्रकाशित हो गयी।
शायद सोशल मीडिया में 'प्रगति' बिना ' शील' से अलगाव के सम्भव नहीं।
यह नमूना है फ़ेसबुक के पोस्ट प्रकाशन पर नियंत्रण करने का। और भी पोस्ट्स इसी तरह से नियंत्रित की जाती होंगी। जिनकी पोस्ट नियमित हटाई जाती होंगी उनकी काट भी वे उसी तरह खोजते होंगे।
इसी सिलसिले में याद आया कि रवींद्र कालिया जी के उपन्यास 'खुद सही सलामत है' में एक महिला पात्र मल्लाही गालियाँ देती है। अपने पात्र से सीधे-सीधे गालियाँ दिलाने में कालिया जी का परहेज़ रहा होगा या नया प्रयोग पर उस पात्र का चित्रण करते हुए कालिया जी ने उसकी गालियों में अक्षरों का क्रम उलट दिया है।
'प्रगति' और 'शील' से शुरू हुई बात 'मल्लाही गालियों' तक पहुँच गयी। फ़ेसबुक जो कराए।

Sunday, October 06, 2024

शरद जोशी के पंच -10



1. जिस देश की हर नदी, हर तालाब गंदा है, वहाँ के हर छात्रों के लिए पता नही यह जानकारी कितनी उपयोगी है कि पानी आक्सीजन और हाइड्रोजन से बनता है। वह सारा जीवन इन तत्वों को हर गिलास में तलाशता रहेगा। उसे बदले में कीड़े और कचरा ही नज़र आएगा।
2. हमारे देश में बच्चा पतला होता है , उसका बस्ता भारी होता है। कुली-मज़दूरों का देश है हमारा। भार उठाने का अनुभव बचपन से होना चाहिए।
3. इस देश के दोहरे दुर्भाग्य हैं। एक तो यह कि जो बहादुर कहलाते हैं वे हत्याएँ करने लगे हैं। और दूसरा दुर्भाग्य यह है कि जो हत्याएँ करते हैं, वे अपने को बहादुर समझने लगे हैं।
4. हमारा दुर्भाग्य यह है कि स्वयं को वीर समझने वाले हत्या में वीरता समझने लगे हैं।
5. इस देश में कहीं-कहीं वीर रस बरसों सड़कर हत्या रस बन गया है।
6. भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता का एक रहस्य यह भी है कि इसने सट्टे और जुए की ऊँचाई प्राप्त कर ली है।
7. आदमी की ज़िंदगी इस देश में यों है कि बचपन में स्कूल में एडमिशन के लिए परेशान, जवानी में नौकरी के लिए और बुढ़ापे में पेंशन के लिए।
8. नौकरी का मिलना एडमिशन से ज़्यादा कठिन है। मिल गई तो लोग सर्विस करते हुए मर गए। तब न मरे तो पेंशन के काग़ज़ मिलने से पहले मर गए। जीवन को श्रेष्ठ और सफल तब माना जाता है, जब आदमी पेंशन लेकर पेंशन खाकर मरे।
9. बड़ी सभ्यता-प्रधान, संस्कृति-प्रधान, गाँव के प्रधान से प्रधानमंत्री तक इस कुर्सी-प्रधान देश की एक प्रधान बात यह है कि बड़े-बूढ़ों की इज्जत करने पर ज़ोर दिया जाता है। मगर इज्जत की नहीं जाती।
10. जो शख़्स एक सरकारी दफ़्तर में पूरी ज़िंदगी खप गया,वह जब रिटायर होता है,तब समस्या की तरह होता है। अर्थात् घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर तक ही महीनों लुढ़कता-घिसटता रहता है, मगर पेंशन के काग़ज़ नही बन पाते।
11. सरकारी व्यवस्था में पैसा जमा करने के सारे दरवाज़े बहुत चौड़े हैं, इंतज़ाम चिकना है। देते से पहुँचते देर नही लगती। मगर जब सरकार से लेना हो तो कितने कील, काँटे, तार, जाली, छन्नी, बंद-खुली खिड़की से आपका हाथ नोट हाथ में लेकर बाहर निकल पाता है। और अक्सर तो निकल ही नही पाता, वहीं फँसा रहता है। जब बाएँ हाथ से कुछ देते हैं तब दाँया हाथ कुछ लेकर बाहर निकल पाता है।

Saturday, October 05, 2024

शरद जोशी के पंच -9



1. जीने का दर्शन दूसरे की मृत्यु हो गया है। हमें हर क़िस्म के समाचार पढ़ने और सुनने के लिए तैयार रहना है, जब तक हम स्वयं समाचार न बन जाएँ। जंगल काट गए हैं,जानवर नही हैं शिकार के लिए,पर शस्त्र हैं,इसलिए पूरा देश जंगल हो गया है। आदमी,आदमी का शिकार कर रहा है। मार रहा है।
2. एक छोटे शहर और महानगर बम्बई में एक बड़ा अंतर यह है कि यहाँ काम होने के बाद कोई किसी को नही पूछता। आज जिस गायक,खिलाड़ी या अभिनेता के पीछे बम्बई वाले पागलों की तरह दौड़ते हैं, वे बुझ जाने के बाद कहाँ किस हाल में ज़िंदगी काट रहे हैं,इसका किसी को पता नही रहता है, न फ़िक्र।
3. व्यावसायिक नगर इस मामले में बड़े निर्मम होते हैं। वहाँ आत्मीयता के सारे प्रदर्शन अस्थायी होते हैं। आज अपनी गरज का मारा जो लाँच देता है, वह कल पानी के गिलास के लिए भी नही पूछता।
4. यदि आप पुलिस को आतंकवादी से निपटने का काम सौंप दें तो वे पूरी तौर पर भिड़ जाएँगे। और जिससे भी भिड़ेंगे उसे मंज़ूर करना पड़ेगा कि वह आतंकवादी है। यह काम इतने ज़ोर-शोर से होगा कि हर तीसरा नागरिक आतंकवादी लगने लगेगा और पुलिस के डर से ऐसा दुम दबाए रहेगा कि सारा आतंकवाद भूल जाए। थाने में जब भी कोई पिटता सुनाई दे,समझिए आतंकवादी है।
5. जिस व्यवसायी को एक चढ़ा हुआ भाव लेने की आदत पड़ जाती है वह इस या उस बहाने वही भाव बनाए रखता है।
6. मंत्री के कक्ष में विधायक न्याय की लड़ाई में संघर्षरत हैं अर्थात वे किसी बलात्कारी या भ्रष्टाचारी को बचाने में लगे हैं। वे यथार्थ को समझ रहे हैं अर्थात किसी ठेकेदार या सप्लायर द्वारा वर्णित तथ्यों को समझ रहे हैं। वे प्रश्नकाल में सवाल पूछ रहे हैं अर्थात किसी व्यावसायिक कम्पनी के स्वार्थों की रक्षा कर रहे हैं।
7. हमारे देश की एक सांस्कृतिक ख़ूबसूरती बरसों से यह है कि हम समस्यायों को घटना के रूप में लेते हैं। इससे शासन व्यवस्था को सुविधा रहती है और जिस पर गुजराती है,वह भी प्रभु-इच्छा मान उसे थोड़ा दुखी हो सहन कर लेता है।
8. समस्यायें बनी रहती हैं और घटनायें भूल दी जाती हैं। इसलिए सरकार कभी घटना को समस्या नही बनने देती। हर साल बाढ़ में लोग डूबते हैं, बलात्कार होते रहते हैं, पुराने या नए मकान ढहते हैं और हमारी व्यवस्था उसे भूलती हुई फिर उस घटना की खबर पढ़ने का इंतज़ाम करती है।
9. कुछ लोगों का कहना है कि जो आदिवासी है,वह आदिवासी बना रहे इसी में उसका कल्याण है। कुछ का ख़्याल है कि बेचारा कब तक आदिम अवस्था में पड़ा सड़ता रहेगा, कुछ भी करके हमें इसे आधुनिक बनाया जाए। मज़ेदार बात यह है कि दोनों हालात में हमें आदिवासी के लिए करना क्या है, कोई नही जानता।
10. क्षेत्र का कल्याण आदिवासी का कल्याण नहीं होता। पक्की सड़कें आदिवासियों को कहीं नही ले जातीं। हाँ, शहरी बुराइयाँ और शोषण का प्रपंच उन तक ज़रूर पहुँच जाता है।
11. देश में हर व्यक्ति के पास आदिवासी कल्याण की निजी योजना है। इस सबसे घबराकर आदिवासी सोचता होगा कि मुझे मेरी झोपड़ी और मेरी मुर्गियों को हमारे हाल पर छोड़ दीजिए, इसी में हमारा कल्याण है।

Thursday, October 03, 2024

लखनऊ पुस्तक मेले में 'साँपों की सभा'



कल लखनऊ जाना हुआ। पुस्तक मेले में। Anoop Mani Tripathi की किताब का विमोचन था। किताब राजकमल प्रकाशन से आयी है। 'साँपों की सभा' नाम है किताब का। चौथी किताब है उनकी। इसके पहले की तीन किताबें हैं:
1. शो रूम में जननायक
2. अस मानुष की जात
3. नया राजा नए किस्से
अनूप मणि की पहली किताब 'शो रूम में जननायक' वीनस केशरी ने अपने 'अंजुमन प्रकाशन' से छापी थी -अंजुमन नवलेखन पुरस्कार -2016 से पुरस्कृत कृति के रूप में। तबसे अनूप मणि की किताब पर कुछ लिखने का वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ। अब तो अनूप मणि ने तक़ादा भी बंद कर दिया है यह कहते -'हमें मालूम है आप लिखेंगे नही।'
बहरहाल इस चौथी किताब के विमोचन का समय पाँच बजे था। हम पाँच बजने में पाँच मिनट पहले पहुँच गए। तब तक लेखक महोदय का कोई अता-पता नही था। अलबत्ता लेखक मंच पर कोई दूसरा कार्यक्रम चल रहा था। वहाँ भी बिजली चली जाने के कारण कुछ देर को कार्यक्रम 'थम' गया। लाइट आने पर फिर चालू हुआ।
फ़ोन करने पर पता चला कि लेखक महोदय जाम में फँसे हुए थे। थोड़ी देर में पधारे पुस्तक मेले में।
तय समय पर लेखक मंच पर पहुँचने पर पता चला कि उसी समय कोई और कार्यक्रम है वहाँ। थोड़ी देर मामला उसी एक ही बर्थ पर दो यात्रियों के दावे की तरह चलता रहा। लेकिन अंतत: लेखक मंच दूसरे कार्यक्रम के लिए तय हुआ। 'साँपों की सभा' पर बात घंटे भर के लिए मुल्तवी हो गयी।
इस बचे हुए समय का उपयोग वहाँ किताबों की दुकाने देखने में किया गया। पहले ही तमाम अनपढ़ी किताबों की याद करते हुए शुरुआत कोई नयी किताब न ख़रीदने के इरादे से हयी लेकिन राजकमल प्रकाशन के स्टाल पर याद आया कि दिल्ली पुस्तक मेले में Vineet Kumar की मीडिया का लोकतंत्र नही मिली थी। उसको ख़रीदने का विचार किया। मिल गयी तो याद आया ज्ञान चतुर्वेदी जी का नया उपन्यास 'एक तानाशाह की प्रेम कथा' भी ख़रीदना बाक़ी है। पिछले दिनों इस किताब की Yashwant Kothari जी की लिखी समीक्षा पढ़कर इसे फ़ौरन मंगाने की बात सोची थी। इसी तरह एक-एक कर किताबें जुड़तीं गयीं। लौटते समय ये किताबें साथ में थीं:
1. सांपों की सभा -अनूप मणि त्रिपाठी
2. मीडिया का लोकतंत्र- विनीत कुमार
3. विमर्श और व्यक्तित्व- Virendra Yadav
4. बोलना ही है -Ravish Kumar
5. धारा के विपरीत- गोविंद मिश्र
6. एक यहूदी लड़की की तलाश- पैट्रिक मोदियानो
7. सलवटें- प्रियंवद
8. छूटी सिगरेट भी कमबख़्त
इनमें वीरेंद्र जी की किताब का विमोचन कुछ दिन पहले ही हुआ था। उनकी वहाँ उपस्थिति का फ़ायदा उठाकर उनके आटोग्राफ भी ले लिए किताब में। प्रियंवद जी की किताब सलवटें उनके कथेतर गद्य का संकलन है। इसका आर्डर आनलाइन दिया थे लेकिन आर्डर कैंसल हो गया था। शायद किताब रही न हो उनके पास। रवीश कुमार की किताब कई बार ख़रीदते-ख़रीदते रह गयी। कल ले ही ली।
अनूप मणि ने ख़ाली समय का उपयोग अपनी किताबों पर आटोग्राफ देते हुआ किया। किताब की दुकान पर थोड़ा टेंढे खड़े होकर दस्तख़त किए किताबों पर। अन्दाज़ से लग रहा था कि अभ्यास किया है आटोग्राफ का। शायद मेले में आने में देरी का वजह भी यही रही हो। मेरी किताब पर दस्तख़त करते हुए लिखा :
"अनूप शुक्ल जी को जो एक दिलचस्प इंसान हैं। सादर -अनूप मणि त्रिपाठी।'
यहाँ 'दिलचस्प' शब्द का मतलब बहुअर्थी है। अपने हिसाब से तय किया जा सकता है।
किताबों पर आटोग्राफ का सिलसिला भी मज़ेदार है। लेखक पाठक की ख़रीदी किताब पर ' शुभकामनाओं सहित' , 'सादर' 'स्नेह/प्यार सहित' लिखकर दस्तख़त करता है उसका एक मतलब यह भी निकलता है कि लेखक अपनी तरफ़ से किताब भेंट कर रहा है। जबकि वह किताब पाठक ने ख़रीदी होती है। लेकिन जो हो इससे किताब अनूठी तो हो ही जाती है।
प्रसिद्ध व्यंग्यकार,कार्टूनिस्ट राजेंद्र धोड़पकर जी को समर्पित किताब 'साँपों की सभा ' में छोटे-बड़े कुल 42 लेख हैं। अनूप मणि की पहली किताब, 'शो रूम में जननायक ' , का कवर पेज राजेंद्र धोड़पकर जी ने बनाया था। 'सांपो की सभा' किताब का ब्लर्ब प्रख्यात कथाकार शिवमूर्ति जी ने लिखा है। लोकभारती पेपरबैक से प्रकाशित इस किताब का दाम 250 रुपए है। पुस्तक मेले में 20% छूट के साथ मिल रही है किताब।
पुस्तक मेले में अनूप मणि त्रिपाठी के कुछ बचपन के दोस्त भी थे। सब अनूप की बचपन की 'हरकतों' की याद करते हुए ताज्जुब टाइप कर रहे थे कि यह लेखक कैसे बन गया। उनको हम कैसे बताते कि यह ताज्जुब हर लेखक दूसरे लेखक के बारे में करता है। कई मर्तबा लेखक खुद अपने बारे में ऐसा सोचता है। इस सहज अचरज के लिए बचपन की दोस्ती की लंबी जान-पहचान की ज़रूरत नही होती।
समय का उपयोग करते हुए शिवमूर्ति जी से कुछ देर बातचीत की। आजकल उनका उपन्यास 'अगम बहै दरियाव' पढ़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह उपन्यास उन्होंने कोरोना काल में मिले अकेलेपन में लिखा। तीन-चार साल लगे लिखने में। आजकल वे यात्रा संस्मरण लिख रहे हैं।
इसी बीच वहाँ बग़ल में ही स्टाल पर चाय भी पी गयी। दस रुपए की चाय पचीस रुपए में मिली। डेढ़ सौ गुनी महँगी। बाक़ी किसी और चीज़ के पूछे ही नहीं। वहीं एक दुकान पर हर किताब 99 रुपए की मिल रही थी। किताबें न हुई बाटा के जूते हो गए।
पहले चल रहे कार्यक्रम के ख़त्म होने के बाद 'सांपों की सभा' का विमोचन हुआ। विमोचनकर्ताओं ने किताब रखकर फ़ोटो खिंचाए। हमने माँग की कि विमोचन में अनूप मणि त्रिपाठी की जीवन संगिनी को भी शामिल किया जाए। पहले इस माँग को ख़ारिज करने का प्रयास किया गया लेकिन फिर उनको श्रोताओं के बीच से बुलाकर विमोचन में शामिल किया गया। विमोचन सम्पन्न हुआ।
विमोचन के बाद अनूप मणि ने अपनी तीन रचनाओं का पाठ किया। (रचना पाठ पोस्ट में संलग्न है)
इसके बाद वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव जी और वरिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति जी ने अपनी बात कही। कथाकर-सम्पादक अखिलेश जी को भी आना था वक्ता के रूप में लेकिन स्वास्थ्य ख़राब होने के कारण आ नही पाए।
वीरेंद्र यादव जी ने कहा : 'आज के बदले हुए समय में अनूप मणि त्रिपाठी जिस तरह व्यंग्य के माध्यम से अपनी बात कह रहे हैं उसके लिए में उनको बधाई देता हूँ।'
वीरेंद्र जी ने आज के समय की जटिलताओं और कुटिलताओं की चर्चा करते हुए अनूप मणि त्रिपाठी के व्यंग्य लेख के सूत्र वाक्य -'हमें लोकतंत्र को लोकतांत्रिक ढंग से समाप्त करना है' पर विस्तार से चर्चा की और बताया :' आज के समय यही हो रहा है। आज सारी संस्थाएँ भी हैं, संविधान भी है, संसद भी है, न्यायपालिका भी है, मीडिया भी है, लेकिन संसद का भी स्वरूप बदला हुआ है, न्याय पालिका का स्वरूप भी बदला हुआ है और मीडिया तो बिलकुल बेपहचाना हो गया है। ऐसे बदले समय में एक व्यंग्यकार का दायित्व बड़ा होता है।
वीरेंद्र यादव जी ने अनूप मणि त्रिपाठी के व्यंग्य लेखों के शीर्षकों पर चर्चा करते हुए उनके लेखन पर अपनी राय रखी। उनकी बारीक नज़र, बेबाक़ी, प्रतिबद्धता की तारीख करते हुए उनको शुभकामनाएँ दीं। (वीरेंद्र जी का पूरा वक्तव्य पोस्ट में सुन सकते है)
शिवमूर्ति जी ने अपने सम्बोधन में अनूप मणि त्रिपाठी को बहुत बहुत बधाई देते हुए कहा -'सारी विधाओं में व्यंग्य लिखना सबसे जटिल है। आज के समय में व्यंग्य लिखना बड़ा हिम्मत का काम है। बिना 'जो भी होगा देखा जाएगा' के भाव के बिना ऐसा लेखन सम्भव नही है। ऐसे लेखन में लेखक के 'वन मैन आर्मी 'में बदल जाने का ख़तरा हमेशा रहता है। हम कामना करते हैं कि ऐसा अनूप मणि त्रिपाठी के साथ न हो। वे निरंतर लिखते रहें और लोग उनके साथ बने रहें। ( शिवमूर्ति जी का पूरा वक्तव्य पोस्ट में सुन सकते है)
इस तरह विमोचन संपन्न हुआ। लगभग आधे घंटे में। जब यह विमोचन चल रहा था तब मंच पर लोग अगले कार्यक्रम का बैनर लगा रहे थे। विमोचन के बाद वक्ता, लेखक मंच से नीचे उतर आए और फोटो सत्र शुरू हुआ। अपने-अपने हिसाब से फ़ोटो लेते हुए लोग यादें सहेजने लगे।
कार्यक्रम की समाप्ति पर Balendu Dwivedi से मुलाक़ात हुई। फ़ैज़ाबाद से अपने दफ़्तर से लौटते हुए पुस्तक मेले के कार्यक्रम में आए थे बालेंदु जी। अपने दो उपन्यास 'मदारीपुर-जंक्शन' और 'वाया फुसतगंज' के बाद आजकल एक नए उपन्यास पर काम चल रहा है उनका- आहिस्ते-आहिस्ते।
सबसे कई बार विदा लेकर कानपुर वापस चलने के लिए हमने उसी गाड़ी वाले को फ़ोन किया जो सबेरे हमको लेकर आया था। वह बीस मिनट की दूरी पर था। बीस मिनट हमने फिर किताबें देखीं। ड्राइवर के आने के बाद कानपुर के लिए चल दिए।

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 शरद जोशी के पंच -8

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1. यह भारतीय सेंसर बोर्ड है,जो सेक्स बेचने वाले बड़े निर्माताओं की जेब में पड़ा रहता है। कोई खोखलापन तो हममें है ही कि हम यह सहन करते हैं।
2. किसी भी मामले की जाँच करना अपने आप में एक अद्भुत रहस्यमय कला है। आप कहें कि हमने फ़लाँ हरकत आँख से देखी तो वे आपकी आँखों की जाँच पड़ताल करेंगे और यह पता लगाने की चेष्टा करेंगे कि जिससे देखा गया वह आँख ही थी।
3.आधुनिक जीवन में एक मूल्य पिछले वर्षों उभरा है कि वे सारी बातें, जिनसे करों की गति धीमी होती है,ग़लत है,उन्हें समाप्त करो।
4. आज़ादी के बाद इस देश में सड़कों के नक़्शे ऐसे बने हैं कि जिन रास्तों से नेता गुजरते हैं,उन रास्तों से अच्छे लोग नही गुजरते।
5. राजनीति में तो यह है कि सड़कों पर हाकी होती है, नेताओं के ड्राइंगरूम में शतरंज। समस्या फ़ुटबाल की तरह उछलती है,हाल बास्केटबाल की तरह डाले जाते हैं, संवाद टेनिस की तरह चलते हैं। दोनों बात करने वाले सुरक्षात्मक खेल खेलने वाले क्रिकेटरों की तरह लम्बे समय तक रन न बनने देते हैं, न आउट होते हैं। जिसके हाथ स्ट्राइकर आ जाए वही कैरम की अधिकांश गोटें ले लेता है।
6. इस देश में, जहां एक नेताईरी के साये में दूसरी नेतागीरी पनपती है, पिछड़े क्षेत्रों में प्रधानमंत्रियो की यात्राओं का बड़ा महत्व है। वह आकार उँगली पर पर राष्ट्रीय -अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं का गोवर्धन उठाता है और स्थानीय समस्याएँ उसकी छाया में छिप जाती हैं।
7. प्रधानमंत्री जब कहता है कि ग़रीबी सारे देश में है और हमें उससे लड़ना है,तो लोकल गरीब संतोष की साँस लेते हैं कि चलो, अखिल भारतीय मामला है, जब निपेटगा तब निपटेगा। वे अपनी ग़रीबी के स्थानीय कारणों के प्रति क्षमाशील हो जाते हैं।
8. प्रधानमंत्री का आगमन एक जश्न होता है जब स्थानीय नेता,भ्रष्ट छूटभैये,नायब तहसीलदार,तहशीलदार,स्थानीय एम.एल.ए. ,एम.पी., मंत्री,मुख्यमंत्री,पुलिस अफ़सर,थानेदार सब एक हो जाते हैं। इस शर्त पर कि तू मेरी शिकायत मत करना,मैं
तेरी नही करूँगा, वे एक दूसरे के काफ़ी काम कर देते हैं।
9. इस देश में पटवारी गाँव की सच्चाई तहसीलदार से छिपाता है, कलक्टर ज़िले की सच्चाई मुख्यमंत्री से छुपाता है, मुख्यमंत्री राज्य की सच्चाई प्रधानमंत्री से। 'सब ठीक है', 'सब चंगा है' , 'सब अच्छा चल रहा है' की गूंज बनी रहती है।
10. खबरें हर क़िस्म की हैं और वे हर दिशा से आती हैं। दूसरों को तंग करने,उसे नष्ट करने का एक दर्शन देश में विकसित हो गया है। हर व्यक्ति के पास पिस्तौल नही है सौभाग्य से, मगर उसका दिमाग़ धीरे-धीरे पिस्तौल हो गया है। वह लगा भले न पाए, मगर एक निशाना हर एक के दिमाग़ में है।

Wednesday, October 02, 2024

शरद जोशी के पंच -7



1. चारों ओर सामाजिक दुर्गुणों की कीचड़ के बीच भारतीय न्याय बरसों से कमाल जैसा एकाकी जीवन जी रहा है।
2. जजों का बुढ़ापा अपराधियों के बुढ़ापे-सा सुखद तो होता नही,यह उतना सुरक्षित भी नही जितना किसी व्यस्त और सफल वकील का। कई रिटायर्ड जज इस आशा से सरकार का मुँह जोहते रहते हैं कि उन्हें किसी जाँच-कमीशन का काम बुढ़ापे में मिल जायगा। स्थिति दयनीय हो जाती है। बुढ़ापे में न्यायाधीशों को दाल-चावल कोई सस्ते में तो बेचता नहीं।
3.यह देश हर मामले में आत्मनिर्भर व्यवस्थाओं के बारे में सोचता है, पर न्याय का पूरा ढाँचा अपने आप में सक्षम और अपनी व्यवस्था खुद सम्भाले,अपनी समस्या से खुद निपटे,यह हम कभी नही सोचते। सच यह है कि अपराधी हो, पुलिस हो, निरपराधी हो, सरकार हो, सब इस उम्मीद में रहते हैं कि न्याय का पलड़ा उनकी तरफ़ और सिर्फ़ उनकी तरफ़ झुके। खींचतान जारी रहती है। न्याय ठिठका रहता है। बयान जारी रहता है। मुक़दमा नही निपटता।
4. झोपड़ियों को लेकर धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण पनप रहा है। धीरे-धीरे सब इस बात पर सहमत होने लगे हैं कि इस देश में झोपड़ियाँ नही होनी चाहिए। यदि हैं तो उन्हें जल्दी टूटना है। यदि तोड़ी नही जा रहीं तो यह लापरवाही है, कायरता है, सरकार का दब्बूपन है कि झोपड़ियों के सामने झुक रही है। वीरता से काम लो, बुलडोज़र से काम लो और झोपड़ी तोड़ो।
5. प्रजातंत्र के विकास में झोपड़ी का सुनिश्चित संबंध वर्षों से यह रहा है कि चुनाव के दो वर्ष पूर्व जब वोटों का मूल्य नेता पहचानने लगते हैं, वे झोपड़ियाँ बनी रहने देते हैं और चुनाव के एक वर्ष बाद जब सत्ता अपनी पकड़ कुर्सी पर मज़बूत करने लगती है,झोपड़ियाँ एकाएक अवैध,ग़ैरज़रूरी और नगर के सौंदर्य पर कोढ़ लगने लगती हैं। दो वर्ष तोड़-फोड़ में बीतते हैं। यहाँ के उजड़े वहाँ और वहाँ के उजड़े यहाँ बसने लगते हैं। फिर धीरे-धीरे नेताओं और अधिकारियों की सौंदर्य-दृष्टि में अंतर आता है। वोटर लिस्ट बन चुकी होती है और झोपड़ियाँ उन्हें फिर सुंदर लगने लगती हैं।
6. राष्ट्रीय दृष्टि स्पष्ट होती जा रही है कि आदमी कहीं रहे,मगर झोपड़ी में न रहे। झोपड़ी से हमारे देश की नाक कटती है। बिल्डर जो सीमेंट का संसार विकसित कर रहे हैं, वही देश है। उसमें रहना ही नागरिकता है। झोपड़ी में रहना अराजकता है, चोरी, बदमाशी है, एक कलंक जो समाप्त होना चाहिए।
7. आदिवासी वहीं है जहां वह पहले था। हर भाषण में उसका ज़िक्र किया गया, हर आयोग ने उस पर सोचा, हर घोषणा-पत्र में उसकी दशा पर चिंता की गई, हर योजना और हर बजट में उसके लिए प्रावधान रखा गया था,पर आज इतने साल बाद जब भारत का प्रधानमंत्री उसके दरवाज़े पर पहुँचता है, वह उसी तरह रोता-बिसूरता मिलता है जैसे वह बरसों पहले मिला था, जब भारत का पहला प्रधानमंत्री उससे मिलने पहली बार उसके ज़िले में गया था।
8. शहर पेड़ चीरता जंगलों में घुस रहा है,पर आदिवासी उतना ही आदिवासी है जितना वह आदिम अवस्था में था। आज भी वह कैमरे से फ़ोटो खींचने काबिल चीज़ है।
9.बड़ी विचित्र, अनूठी -सी चीज़ होता है इंस्पेक्टर। सब कुछ चलता रहता है,वह इंसपेक्ट करता रहता है। थानों में क्या कुछ नही होता,पुलिस वाले क्या कुछ नही करते, मगर जिसे कहते हैं पुलिस इंस्पेक्टर,वह बराबर हर जगह इंस्पेक्शन करता मिलेगा।
10. इस देश का हर हिस्सा इंसपेक्ट होता रहा है और देश की हालत आप देख ही रहे हैं। मगर आपके देखने से कुछ नही होता। देखेगा तो इंस्पेक्टर देखेगा। सरकार उसके देखे से देखेगी। वह सरकार की बड़ी-बड़ी आँखे हैं। वह सत्ता का कमल-नयन है।
11. वर्ष दो भागों में बंटता है इस देश में। एक समय जब इंस्पेक्टर साहब आने वाले होते हैं। एक वह जब वे इंस्पेक्शन कर जा चुके होते हैं। इस देश में आशावाद इन्हीं दो हिस्सों में विभाजित है। रहा है बरसों से। यह विभाजन प्रेम की तरह है। जब वे देख रहे होते हैं। जब वे नही देख रहे होते हैं। दोनों अवस्था में सजने-सँवरने और बिगड़ने में एक सार्थकता है। वे देखेंगे, वे कुछ काम करेंगे। हम उनके द्वारा इंसपेक्टित होंगे।

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अपनी आदत है चुप रहते हैं



अपनी आदत है, चुप रहते हैं,
या फिर बहुत खरा कहते हैं।
हमसे लोग खफ़ा रहते हैं॥
आंसू नहीं छलकने देंगे
ऐसी कसम उठा रखी है
होंठ नहीं दाबे दांतों से
हमने चीख दबा रखी है।
माथे पर पत्थर सहते हैं,
छाती पर खंजर सहते हैं
पर कहते पूनम को पूनम
मावस को मावस कहते हैं।
हमसे लोग खफ़ा रहते हैं॥
हमने तो खुद्दार जिंदगी के
माने इतने ही माने
जितनी गहरी चोट अधर पर
उतनी ही मीठी मुस्कानें।
फ़ाके वाले दिन को, पावन
एकादशी समझते हैं
पर मुखिया की देहरी पर
जाकर आदाब नहीं कहते हैं।
हमसे लोग खफ़ा रहते हैं॥
हम स्वर हैं झोपड़पट्टी के
रंगमहल के फाग नहीं हैं
आत्मकथा बागी लहरों की
गंधर्वों के राग नहीं हैं।
हम चिराग हैं, रात-रात भर
दुनिया की खातिर जलते हैं
अपनी तो तैराकी उलटी है
धारा में मुर्दे बहते हैं।
हमसे लोग खफ़ा रहते हैं॥
-शिवओम ‘अम्बर’फ़र्रुखाबाद
अंबर जी की यह कविता पहली बार कब सुनी , याद नहीं। लेकिन यह याद है कि इसकी पंक्ति :
‘अपनी तो उल्टी तैराकी है, धारा में मुर्दे बहते हैं ‘
हमारे मित्र Vinod Tripathi की पसंदीदा पंक्ति थी और वह इसे नारे की तरह प्रयोग करते हुए अक्सर दोहरते थे।
वरिष्ठ कवि अंबर जी देश के कवि मंचों के सर्वश्रेष्ठ संचालकों में रहे हैं। शाहजहांपुर में होने वाले कवि सम्मेलन और मुशायरे के लिए संचालन के लिए शिवओम अंबर जी और मेराज फैजाबादी जी हमारे पहली पसंद होते थे। दोनों के संयुक्त संचालन कवि सम्मेलन और मुशायरा सफलता की गारंटी होता था।
पिछले दिनों आर्मापुर में हिन्दी पखवाड़े के अवसर पर संपन्न कवि सम्मेलन में अन्य कवियों के साथ अंबर जी को फिर से सुनने का मौक़ा मिला। हमारी फ़रमाइश पर उन्होंने मेरी पसंदीदा कविता भी सुनाई। आप भी सुनिए।

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Sunday, September 29, 2024

विश्व दिल दिवस

आज विश्व दिल दिवस है मतलब वर्ल्ड हार्ट डे । तरह-तरह के नोटिफ़िकेशन उछल-उछलकर बता रहे हैं -'आज विश्व दिल दिवस है।'
ये दिन भी न बड़े बदमाश होते हैं। जिसका मन होता आकर खड़ा हो जाता है सामने। मनाओ हमको। सेलिब्रेट करो।
आजकल आए दिन कोई न कोई दिवस मनाया जाता है। हर दिन पर किसी न किसी दिवस का क़ब्ज़ा है। दिवस आबादी की तरह बढ़ रहे हैं। आने वाले समय में दिनों के हाल भी रेलवे के जनरल डिब्बे की तरह होंगे। एक-एक दिन में कई-कई दिवस ठूँस दिए जाएँगे। सुबह एक दिवस, दोपहर दूसरा दिवस, शाम तीसरा। रात किसी और दिवस के नाम। मतलब दिनों में 'दिवसों की गठबंधन सरकार' चलेगी।
ऐसा हुआ तो दिवसों में मारपीट, जूता-लात भी हो सकती है। एक दिवस किसी दूसरे दिवस की पोलपट्टी खोलेंगा। एक-दूसरे को ग़ैरज़रूरी बतायेंगा।कोई चिरकुट सा दिवस भाइयों-बहनों कहते हुए पूरे दिन पर अपना क़ब्ज़ा माँगेगा।कहेगा -'हम अवतारी दिवस हैं। सिर्फ़ हमको मनाओ।' बाक़ी दिवस उसकी हरकत को तानाशाही बताते हुए विरोध करेंगे। तब वह 'कैलेंडर माता की जय' बोलकर अपना जलवा जमाने का प्रयास करेगा।
मतलब मामला एकदम लोकतांत्रिक हो जाएगा। जहां सिर्फ़ सिर्फ़ क़ब्ज़े की लड़ाई होगी।
बहरहाल यह जब होता तब होगा फ़िलहाल तो बात आज मनाए जा रहे विश्व दिल दिवस की मतलब world heart day की।
आज के समय दुनिया में दिल की बीमारी से मरने वालों की संख्या सबसे ज़्यादा है। औसतन दो करोड़ लोग दिल की बीमारी से विदा होते हैं। दिल की बीमारी से बचाव के लिए ही विश्व दिल दिवस मनाया जाता है।
' विश्व दिल दिवस' की संकल्पना 1997 से 1999 तक विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष रहे Antoni Bayés de Luna की थी। पहली बार 24 सितम्बर, 2000 को मनाया गया। इसके बाद सितम्बर महीने के आख़िरी इतवार को मनाया जाता है। इस लिहाज़ से आज विश्व दिल दिवस है। इस बार की थीम है -use heart for action. कार्य के लिए दिल का उपयोग करें।
कार्य के लिए दिल का उपयोग करने की थीम का उपयोग तो अपन न जाने कब से कर रहे हैं। हमेशा हर काम दिल से करते हैं। दिमाग़ ने कभी दख़ल देने की कोशिश की तो उसे भगा देते हैं। दिल से कहते हैं -'हाँ, भाई तू जो कहे वही कहेंगे। वही करेंगे। हमारे कार्यव्यवहार में न जाने कब से दिल की सरकार चल रही है। एक तरह से तानाशाही का मामला है। एक पार्टी सरकार।'
फ़ेसबुक पर भी जब से दिल वाले ईमोजी का चलन हुआ हमने पोस्ट पसंदगी के लिए इसी का उपयोग किया। यहाँ तक की कोई पोस्ट नापसंद भी हुई तो भी इसी दिल वाली ईमोजी ही लगाई। बहुत नाराज़गी हुई किसी पोस्ट पर तो दो बार दिल लगा देते हैं। हिसाब बराबर हो जाता है।
दिल पर तमाम गाने बनाए गये हैं। गानों से गायक की शख़्सियत का अन्दाज़ लगाया जा सकता है:
'दिल चीज़ क्या आप मेरी जान लीजिए,
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए ।'
गाने से ऐसा लगता है कि नायिका नायक को के लिए बड़ी क़ुर्बानी के लिए तैयार है। लेकिन ऐसा है नहीं। वह असल में दिल देना नहीं चाहती। दिल कंजूस है नायिका। उसको पता है नायक बार-बार आएगा-जाएगा। लापरवाह है। दिल दे देगी उसको तो ठीक से रखेगा नहीं। तोड़-फोड़ करेगा। इसी लिए वह दिल की जगह जान देने की बात करती है। यह एक तरह की धमकी भी है। मेरी बात मान लो नहीं तो जान दें दूँगी। फँस जाओगे आत्महत्या के लिए उकसाने के केस में।
और भी तमाम सारी बातें हैं दिल के बारे में। कहने का मन भी है। लेकिन दिल कह रहा है कहने लगे तो लफड़ा होगा। शुरुआत होते ही दिल की बात व्यथा कथा हो जाएगी।यही तरीक़ा चलन में है। दिल की बात में दर्द न हो तो कोई मानता नहीं। बिना लुटे-पिटे अन्दाज़ में बयान दिए लोग विश्वास नहीं करते कि दिल की कहानी कह चल रही है।
दिल की बात कहने का बहुत मन था लेकिन दिल कह रहा -'मत ही कहो। कोई समझेगा नहीं। दिल की बात दिल वाले ही समझेंगे। आज किसी का दिल उसके पास होगा नहीं। सब गए होंगे अपने साथी दिल के पास।'
हमने दिल की बात मान ली। दिल की अभिव्यक्ति पर रोक लगा दी। अभिव्यक्ति पर रोक लगाने के मामले में हमारा दिल सरकार से कोई कम ताकतवर थोड़ी है।
आपका दिल क्या कहता है इस बारे में?
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