Sunday, August 31, 2025

मेट्रो में पसीना सुखाती, किताब पढ़ती बालिका

 

परसों श्रीलाल शुक्ल जन्मशती संगोष्ठी में जाना हुआ। कार्यक्रम रवींद्र भवन में होना था। दिल्ली मेट्रो एप्प में देखा कि सबसे पास का मेट्रो स्टेशन मंडी हाउस है। फिर नेट पर देखा तो पता चला 270 मीटर दूर है मंडी हाउस से रवींद्र भवन।
पहले सोचा था घर से नोयडा सिटी सेंटर तक पैदल जाएँगे। लेकिन हमेशा की तरह निकलने में देर हो गई। फिर सोचा ऑटो से चले जाएंगे। उबर और रैपिडो में ऑटो का किराया 86 रुपए बता रहा था। 900 मीटर दूरी के 86 रुपए ज़्यादा लगे लेकिन देर भी हो रही थी। ऑटो करें या पैदल जाएँ सोचते हुए कॉलोनी के गेट पर पहुँच गए। सामने ऑटो खड़े थे। एक से पूछा -"नोयडा सिटी सेंटर चलोगे?" उसने बगल वाले ऑटो की तरफ़ इशारा किया -"ये जाएगा।"
दूसरे वाले से पूछा तो बोला -"हाँ, चलेंगे।" किराया बताया -"पचास रुपये।" 36 रुपए और दस-पंद्रह मिनट बचने की ख़ुशी मन में धारण किए हम लपककर ऑटो में बैठ गए। पाँच से भी कम मिनट में स्टेशन पहुँच गए।
प्लेटफार्म पर पहुँचने के बाद देखा कि मेट्रो प्लेटफार्म पर खड़ी थी। यात्री सामान की तरह ठसाठस पैक हो गए थे मेट्रो में। दरवाज़े बंद ही होने वाले थे। हम लपकते हुए और भागते हुए की स्पीड की औसत स्पीड से मेट्रो में धँस गए। लपकते और भागते के औसत से जाने की बजाय अगर हम टहलते हुए जाते मेट्रो की तरफ़ तो या तो मेट्रो छूट जाती या फिर मेट्रो में पहले से मौजूद यात्रियों की भीड़ को देखकर अंदर घुसने में हिचकिचाते। मेट्रो की तरफ़ तेजी से जाने से जड़त्व के नियम का भी सहयोग मिला और हम धँस ही गए यात्रियों के समन्दर में। हमारे अंदर घुसते ही मेट्रो के दरवाजे बंद हो गए। मेट्रो चल दी।
अंदर घुसते ही जिस मेट्रो में भीड़ के कारण दाखिल होना मुश्किल हो रहा था उसी में ऐसे जगह बनती गई कि हम सरकते हुए गेट से कई मीटर अंदर यात्रियों के सामने पहुँच गए। हमारे सामने की सीट महिला सीट थी।उनमें महिलाएँ बैठी थी।
महिला सीट के सामने खड़े-खड़े हम सोच रहे थे कि मेट्रो, बस वगैरह में महिलाओं, बुजुर्गों की सीट तय होती है। महिला सीट पाने की अधिकारिणी महिला को तो अपने शरीर और पहनावे के कारण अपना हक पाने के लिए कोई अलग से परिचय पत्र नहीं दिखाना पड़ता है। अक्सर उनको उनकी सीट मिल ही जाती है। लेकिन बुजुर्गों के साथ ऐसा कम ही होता है। कोई कब बुजुर्ग हो गया यह उसके चेहरे या पहनावे से पता नहीं चलता। अक्सर वरिष्ठ नागरिक अपने लिए आरक्षित सीट पर बैठे युवाओं को देखते खड़े रहते हैं। मारे संकोच के कुछ कह नहीं पाते।
मेट्रो में काफ़ी भीड़ थी। लोग हाथ ऊपर किए मेट्रो के लटकते हुए कुंडे पकड़े मेट्रो के साथ झूलते खड़े थे। मुझे लगा कि किसी चिरकुट नेता को अपनी कोई महा चिरकुट बात मनवानी हो तो मेट्रो का उपयोग कर सकता है। इसके लिए वह सुबह दफ़्तर के समय या शाम को लौटते समय मेट्रो के डब्बे में घुस जाये और अपनी महा चिरकुट बात को बताकर कहे -"जो लोग हमारी बात से सहमत से हों वे अपने हाथ उठायें।" इसके बाद लोगों के ऊपर उठे हुए हाथों के फोटो लेकर उनको गिनते हुए कह दे बहुमत हमारे समर्थन में है, इसलिए हमारी बात सही है।
किसी स्टेशन पर रुकते ही यात्रियो के थान के थान मेट्रो से निकलकर स्टेशन पर फ़ैल जाते। ठट्ठ के ठट्ठ यात्री मेट्रो से उतर कर प्लेटफार्म पर चलने लगते है। ऐसे लगता जैसे किसी आलू के बोरे को यात्रियो के रूप में प्लेटफार्म पर उलट दिया गया हो।
एक स्टेशन पर एक लड़की हमारे डब्बे में आई। उसके अंदर आते समय तो मैंने नहीं देखा लेकिन पास आने पर उसने मेरे पास खड़े यात्री को अपनी पीठ में लदा पिट्ठू बैग किनारे कर लेने को कहा ताकि वह आगे आ सके। यात्री अपने बैग सहित सरककर आगे हो गया। बालिका के लिए जगह बन गई।
लड़की ने महिला यात्रियों के लिए आरक्षित सीट के सामने खड़े होकर अपने बैग से एक छुटका पंखा टाइप निकाला और उसको अपनी चेहरे की तरफ़ करके पंखे का स्विच आन कर दिया। बालिका के चेहरे पर लटकी एकाध पसीने की बूँदों का मेरे देखते-देखते क़त्ल टाइप हो गया। पंखे की हवा ने उसके चेहरे पर लटका पसीना सुखा दिया। बालिका अपने चेहरे के सामने पंखे को हिलाते-डुलाते हुए न आया हुआ पसीना भी एडवांस में सुखाती रही।
मैंने ऐसा पसीना सुखाने वाला पंखा पहली बार देखा था। बाद में घर में लोगों को बताया तो पूछा गया -"तुमने पंखा पहली बार देखा कि मेट्रो में लड़की को पहली बार पंखे के साथ देखा?" हमने बताया-" हमने सब कुछ पहली बार देखा। हमको पता भी नहीं था कि ऐसा कोई पंखा होता है।"
हमको बताया गया कि यह आम चलन में है। इसको यूएसबी फैन कहते हैं।
बालिका हमारे आगे ही खड़ी थी। उसने बैग से एक किताब निकाली और खड़े-खड़े उसे पढ़ने लगी । मेट्रो के साथ हिलती-डुलती बालिका को किताब पढ़ते देखकर हमको बचपन में खड़े होकर हिलते-डुलते पहाड़े याद करते बच्चे याद आ गए । मेट्रो में यात्रा करते हुए बचपन की यात्रा करने में कोई टिकट नहीं पड़ा। स्मृतियों की यात्राएँ हमेशा मुफ्त होती हैं। इसी लिए दुनिया के तमाम लोग यादों के सफ़र पर जाते रहते हैं।
बच्ची जो किताब पढ़ रही थी वह अंग्रेजी की थी। हमको उत्सुकता हुई तो हमने किताब का नाम पढ़ा । किताब का नाम था - Infinite potential unlimited success. मतलब अनंत क्षमता,असीम सफलता। शायद कोई मैनेजमेंट की किताब थी। शायद कोई इंटरव्यू देने जा रही हो बालिका। पीछे से बालिका के किताब पकड़े हुए हाथ की लकीरें भी दिख रहीं थीं। लकीरें एक-दूसरे को प्रतिद्वंदियों की तरह काटती-पीटती लग रहीं थीं। हाथ की लकीरें किसी उम्रदराज का हाथ होने का इशारा कर रहीं थीं लेकिन चेहरा उससे अलग बयान जारी कर रहा था।
करीब पाँच स्टेशन साथ चलने के दौरान हम बालिका को किताब पढ़ते और एक ही पन्ने पर ठहरे देखते रहे। मन किया उसका फ़ोटो लें या फिर उसको संभावित इंटरव्यू के लिए शुभकामनाएं दे दें। लेकिन दोनों ही इरादों पर अमल करने की हिम्मत नहीं हुई। बाद में उसको याद करके चैटजीपीटी पर बालिका की स्थितियां बयान करते हुए फ़ोटो बनाने के लिए कहा कई बार कोशिश करने के बावजूद वैसी तस्वीर बनी नहीं जैसी हमने मेट्रो में देखी थी। हमको बार -बार गाना याद आता गया -"तस्वीर बनाता हूँ, तस्वीर नहीं बनती।"
मंडी हाउस पर उतरकर सीढ़ियों से ऊपर जाते हुए देखा कि हर सीढ़ी पर किलोकैलोरी के निशान बने हुए थे। एक सीढ़ी चढ़ने में कितने कैलोरी कम होंगे इसका हिसाब दिया था। वजन कम करने वालों के लिए यह अच्छा हिसाब है- "सीढ़ियाँ चढ़ते जाओ, कैलोरी खर्च गिनते जाओ।"
स्टेशन से बाहर आकर देखा रवींद्र भवन 270 मीटर दूर था। लपकते हुए चल दिए। दो मिनट बाद देखा दूरी 900 मीटर हो गई थी। मतलब हम ग़लत दिशा में चल रहे थे। वापस लौटे। रास्ते में मंडी हाउस के चौराहे पर लगे स्क्रीन के किसी विज्ञापन में दो बाबा लोग लड़ते-झगड़ते दिखाई दिए। दूर होने के कारण समझ में नहीं आया कि किस किए लड़ रहे थे बाबा लोग। शायद गद्दी की लड़ाई हो। मुझे याद आया कि किसी ने संत नगरी के महंतों का जिक्र करते हुए लिखा था -"यहाँ हर महंत के कमर में कट्टा रहता है।"
चौराहे के पास ही महान रूसी कवि पुस्किन की बड़ी सी मूर्ति लगी हुई थी। भारत-रूस की मैत्री के प्रतीक के रूप में रूस के महान कवि की प्रतिमा लगाई गई होगी। बड़ी बात नहीं कि कल को अगर भारत से रूस के राजनयिक संबंध खराब होते हैं तो कोई कट्टर देश भक्त पुश्किन की मूर्ति पर कालिख पोत दे। ऐसा पिछले दिनों हुआ था जब हालिया भारत-पाकिस्तान झड़प के बीच तुर्की द्वारा पाकिस्तान को ड्रोन सप्लाई करने की बात पर पर गुस्साए कुछ लोगों ने दिल्ली के मुस्तफा कमाल अतातुर्क मार्ग का नाम बदलने की माँग की है। उन लोगों को शायद पता नहीं होगा कि तुर्की गणराज्य के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने प्रसिद्ध भारतीय क्रांतिकारी बिस्मिल की वीरता से प्रभावित होकर उनके सम्मान में तुर्की के एक शहर का नाम 'बिस्मिल' रखा था।
पुस्किन की मूर्ति के बगल में ही रवींद्र भवन था। अपन पुस्किन की मूर्ति को आदर के साथ देखते हुए रवींद्र भवन पहुंच गए जहाँ श्रीलाल शुक्ल जन्मशती संगोष्ठी का आयोजन हो रहा था।
-श्रीलाल शुक्ल जन्मशती संगोष्ठी की रपट का लिंक

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