श्रीलंका में एक हफ़्ता रहकर हम वापस भारत लौट आए। लौटते समय एक हसीन हादसे के शिकार हुए हम लोग। हादसे जिनसे उबर जाया जाता है, वो हसीन ही कहलाते हैं।
हुआ यह कि रात की फ़्लाइट से हम लोग वापस लौटे। फ्लाइट में जो मिला खाने-पीने को वो खा-पीकर कोलंबो से दिल्ली पहुँचकर। दिल्ली पहुंचकर इमीग्रेशन पर पासपोर्ट में भारत वापसी का ठप्पा लगवाकर हम लोग बाहर आ गए। कन्वेयर बेल्ट पर सामान का इंतज़ार करने लगे। अनन्य पीछे से आ रहे थे।
अनन्य ने पास आने पर पूछा -"मेरा बैग आपके पास है?" हम लोगों ने कहा नहीं। उस बैग में अनन्य के पैसे, मोबाइल और कई कार्ड थे। वह पीछे कहीं रह गया था।
पीछे रह गए बैग की याद करते हुए क़यास लगाए गए कि कहाँ रह गया होगा। यात्रा में सामान एक हाथ से दूसरे हाथ में टहलता रहता है। एक-दूसरे का बोझ हल्का करने, सहायता करने के भाव के चलते यात्राओं में एक का सामान कोई दूसरा उठा लेता है। दूसरे का कोई तीसरा। इसी चक्कर में कभी सामान इधर-उधर हो जाता है।
छोटा होने और ट्रिप लीडर होने के चलते कई अनन्य को दूसरों का सामान उठाना पड़ा। इस बार भी कुछ ऐसा ही। दूसरे का सामान लादने के चक्कर में अपना छूट गया शायद।
बैग की खोज में अनन्य वापस जहाज़ की तरफ़ जाने लगा। लेकिन इमिग्रेशन वालों ने अंदर जाने नहीं । कहा , अब आप वापस नहीं जा सकते। अपने सामान के बारे में खोया-पाया विभाग से संपर्क करें।
हम लोग परेशान। बैग में अनन्य पैसे के अलावा अनन्य के तमाम कार्ड, परिचय पत्र आदि और दूसरी जरूरी चीजें थी जिनको दुबारा बनवाना अपने में बड़ा झंझट और समय खपाने वाला काम।
एयरलाइंस वालों को बताया तो उन्होंने कहा -"हम लोग जहाज़ में दिखवा लेते हैं।सामान अगर छूटा होगा तो मिल जाएगा।"
हम लोग याद कर रहे थे कि कहाँ छूटा होगा बैग? एक अनुमान यह कि जहाज़ में छूट गया होगा , दूसरा यह कि एक जगह रुके थे फ़ोन करने को , शायद वहीं रख दिया होगा बैग। हमारे पास इंतज़ार करने के अलावा कोई चारा नहीं था।
कुछ देर बाद जहाज़ वालों ने बताया कि जहाज में जिन सीटों पर हम बैठे थे वहाँ कोई सामान नहीं छूटा है। इसका मतलब बैग जहाज से बाहर आने के रास्ते में कहीं छूटा होगा।
इस बीच हमें याद आया कि हमारे एक मित्र के मित्र हवाई अड्डे की सिक्योरिटी में काम करते हैं। जाते समय हमने उनसे बात भी की थी। उन्होंने कहा था -"कोई काम हो तो बताइयेगा।"
हमने अपने मित्र को खड़े-खड़े कई कई फ़ोन कर डाले। उधर से कोई जबाब नहीं आया।
इस बीच एयरलाइंस वाले ने बताया कि उनका स्टाफ़ जहाज़ से वापस देखता आयेगा। वैसे भी एयरपोर्ट कोई सामान खोता है तो कोई उठाता नहीं है। कहीं कोई सामान दिखता है तो उसे सिक्योरिटी में जमा करवा देता है। खोया हुआ सामान एकाध दिन में मिल जाता है।
बैग खोने-मिलने की आशा-आशंका के बीच झूलते हुए हम देर तक एयरपोर्ट के आगमन वाले अंदरखाने में खड़े रहे। लगभग सभी लोग अपना-अपना सामान लेकर अपने-अपने घर जा चुके थे। हम अनुमान लगा रहे थे कि जो-जो चीजें छूटी हैं उनको दुबारा बनवाने में क्या-क्या करना पड़ेगा?
इस बीच एयरलायंस की एक महिला सहायक सामने से आते दिखी। अपने हाथ में लिए बैग को हिलाते हुए उसने पूछा -"यह है आपका बैग?"
अनन्य ने लपक कर 'हाँ' कहते हुए बैग उस महिला सहायक से लिए। कई-कई बार थैंक्यू, थैंक्यू वेरी मच बोला। मुस्कराहटों का आदान-प्रदान हुआ। कन्वेयर बेल्ट, जहां हम खड़े थे, के आसपास का माहौल धन्यवाद मय हो गया। हादसा जो कुछ समय तक हादसा लग रहा था अब हसीन हादसे में तब्दील हो गया।
बैग मिल गया । इस घटना से सीख भी मिली कि हवाई यात्राओं में सामान कम से कम रखने के अलावा यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अपना सामान अपने पास ही रखना चाहिए। एक-दूसरे के हाथ में देने-लेने के चक्कर में सामान इधर-उधर हो सकता है।
लेकिन यह इस तरह की सीख है जिसका पालन अक्सर ही हम नहीं करते।
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