Saturday, August 09, 2025

काकोरी एक्शन के सौ साल


 आज 9 अगस्त है। आज से सौ साल पहले देश के क्रान्तिकारियों ने काकोरी में ट्रेन रोक कर तत्कालीन अंग्रेज सरकार का खजाना लूट लिया था।

अशफ़ाकउल्ला, शतीद्रनाथ बख़्शी और राजेंद्र लाहिड़ी दूसरे दर्जे में तथा रामप्रसाद बिस्मिल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल, मुकुन्दी लाल, बनवारी लाल, मन्मथ नाथ गुप्त और चंद्रशेखर आज़ाद तीसरे डब्बे में सवार होकर ट्रेन में बैठे। काकोरी में जंजीर खींची गई। गार्ड और ड्राइवर को पेट के बल लिटाकर तिजोरी को ट्रेन से नीचे गिरा दिया गया। तिजोरी तोड़कर उसका पैसा लेकर क्रांतिकारी लोग चले गए। अगले दिन के अखबारों में 'सनसनीखेज ट्रेन डकैती' का समाचार छाया था।
काकोरी ट्रेन डकैती ने अंग्रेज़ सरकार को हिला दिया। बाद में ट्रेन डकैती में शामिल लोगों में से चार लोगों को फाँसी , चार लोगों को कालापानी उम्र क़ैद की सजा और सत्रह लोगों को लंबी सजायें सुनाई गयीं।
काकोरी एक्शन के सौ वर्ष होने के उपलक्ष में काकोरी एक्शन शताब्दी अभियान के तहत पंजाब के फिरोजपुर ((भगत सिंह स्मारक/समाधि) से उत्तर प्रदेश के काकोरी तक 1 अगस्त से 9 अगस्त तक यात्रा का आयोजन किया गया है । यह यात्रा राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के विभिन्न गाँवों, औद्योगिक क्षेत्रों और शहरों से होकर गुजरेगी। आज इस यात्रा का समापन दिवस है।
5 अगस्त, 1925 को यात्रा के दौरान दिल्ली राम मोहन हॉल, आईटीओ में विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। विचार गोष्ठी में एस इरफ़ान हबीब , गौहर रज़ा और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे।
एस इरफान हबीब जी ने अपनी बात कहते भगतसिंह के बारे में विस्तार से जानकारी दी। भगतसिंह की मानसिक परिपक्वता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 17 साल की उम्र में अपना पहला लेख लिखा था। भगतसिंह ने जातिवाद, सांप्रदायिकता पर सवाल उठाए। आजादी के आंदोलन में शामिल कुछ नेताओं की दलितों के बारे में सोच पर सवाल उठाते हुए भगतसिंह ने लिखा था -
" कुछ नेता लोग मंच पर दलितों से मिलने के बाद घर जाकर अपने कपड़े बदलते हैं।"
गौहर रजा जी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आज के हालात सौ साल पहले के हालात से बदतर हैं। उन्होंने अपनी नज़्में सुनाई।
कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने भी अपनी बात रखी। एक वक्ता का मानना था -" आजादी तब महत्वपूर्ण है जब देश के बारे में निर्णय लेने में 98% लोगों की भागेदारी हो। आज स्थिति उलट है। आज सरकार किसान विरोधी, बहुजन विरोधी, साम्रदायिक और पूंजीपति समर्थक है। अगर क्रांतिकारियों के आदर्शों पर चलकर आजादी मिली होती तो ऐसा नहीं होता।"
कार्यक्रम की शुरुआत में 'जागा है इंसान जमाना ,बदल रहा' का समूह गान भी हुआ।
वक्ताओं ने रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला के हवाले से क्रांतिकारियों की साझी विरासत का विस्तार से जिक्र किया । इस मौके पर प्रसिद्ध लेखक Sudhir Vidyarthi सुधीर विद्यार्थी जी की किताब 'साझी शहादत साझी विरासत' और
'हमारी विरासत (शहीदों के कलम से कुछ नज्म)' का विमोचन भी हुआ।
सुधीर विद्यार्थी जी ने अपनी किताब ' साझी शहादत साझी विरासत' में काकोरी एक्शन के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि यह एक्शन एक ऐसा एक्शन था :
* जिसने अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती दी।
* जिससे क्रांतिकारी धारा ने समता और न्याय आधारित एक देश का सपना देखा
* जो सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बना।
देश की आजादी के अपनी जान तक कुर्बान करने के लिए तैयार क्रांतिकारियों के जज़्बात बताते हुए बिस्मिल ने लिखा :
मरते बिस्मिल, रोशन, लाहिड़ी, अशफ़ाक़ अत्याचार से
होंगे सैकड़ों पैदा इनके रुधिर की धार से।
- राम प्रसाद बिस्मिल, (गोरखपुर जेल, 1927)
काकोरी एक्शन यात्रा में महिलायें बच्चियाँ भी शामिल थे। चालीस-पचास लोग। युवा लोग कार्यक्रम स्थल में वितरित किए जाने वाले पर्चे तैयार कर रहे थे। क्रांतिकारियों से संबंधित कई किताबें भी वहाँ बिक्री के लिए उपलब्ध थीं। हमने भी कुछ किताबें खरींदी।
काकोरी एक्शन यात्रा कल शाहजहांपुर पहुंची। शहीद अशफाक उल्ला की मजार पर पुष्प अर्पित किए गए। शहीदों को याद किया गया।
काकोरी एक्शन में फाँसी की सजा पाने वालों में शाहजहांपुर के तीन शहीद (रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्ला और रोशन सिंह) शामिल थे। इन शहीदों के नाम पर ही शाहजहांपुर को शहीदों की नगरी कहलाती है। वीररस के कवि विकल जी ने लिखा है :
" विश्व के संताप सब बोये गए है।
धूल के कण रक्त से धोए गए हैं।
पांव के बल मत चलो अपमान होगा।
सर शहीदों के यहां बोये गए हैं।।"
काकोरी एक्शन के सौ साल होने के मौके पर आज काकोरी में कार्यक्रम होंगे। इस मौके पर देश की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान करने वालों शहीदों को नमन।

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