आजकल अमेरिका के राष्ट्रपति दुनिया के देशों को टैरिफ, जुर्माना, आर्थिक प्रतिबंध की धमकी देते रहते हैं । खबरों के अनुसार अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा क़र्ज़दार देश है। । भारत के मुकाबले दस गुना से भी ज्यादा कर्ज अमेरिका के ऊपर है। सामान्य बातचीत के हिसाब से जितना बड़ा कर्ज़ उतनी हालत ख़स्ता। इसके बावजूद, दुनिया का सबसे बड़ा क़र्ज़दार देश बाकी मुल्कों पर आए दिन ऐंठता रहता है। दुनिया के दस बड़े क़र्ज़दार मुल्कों की सूची इस प्रकार है :
1. संयुक्त राज्य अमेरिका: 33,229 अरब डॉलर
2. चीन: 14,692 अरब डॉलर
3. जापान: 10,797 अरब डॉलर
4. यूनाइटेड किंगडम: 3,469 अरब डॉलर
5. फ्रांस: 3,354 अरब डॉलर
6. इटली: 3,141 अरब डॉलर
7. भारत: 3,057 अरब डॉलर
8. जर्मनी: 2,919 अरब डॉलर
9. कनाडा: 2,253 अरब डॉलर
10. ब्राजील: 1,873 अरब डॉलर
अमेरिका का दुनिया का सबसे बड़ा क़र्ज़दार देश होने के बावजूद दुनिया के बाकी देशों पर ऐंठता रहता है। दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्षों को हेडमास्टर की तरह हड़काता रहता है, मुर्गा जैसा बनाता रहता है। दूसरे देशों के मुखिया भी तमाम मजबूरियों के चलते या तो चुप रहते हैं या बोलते हैं तो 'अमेरिका सुहाती।' शायद बोलने के पहले पूछते भी हों कि -"देखिए, ये जवाब दे रहे हैं आपको, ठीक रहेगा? कुछ ज़्यादा तो नहीं हो गया?"
दुनिया की आर्थिक गतिविधियाँ और देशों के बीच संबंध और कार्यव्यापार एक आम इंसान के समझ में आने वाली चीजें नहीं हैं। लेकिन एक सामान्य नागरिक के नाते कोई देश, जिसकी गतिविधियाँ दुनिया की आधी से ज़्यादा परेशानियों कारण है, दुनिया के बाकी देशों से हफ़्ता वसूली वाले रंगदारों की तरह व्यवहार करे, यह देखकर ख़राब लगता है । यहाँ से ये मत ख़रीदो, उससे संबंध मत रखो, उससे बोले तो जुर्माना लगा देंगे, ये किया तो वो कर देंगे- ये सब इसी तरह की बातें हैं। ख़राब लगता है।
वर्तमान अमेरिकी रुख अपने दुनिया के कई देशों के लिए, अपने देश के लिए भी एक बड़ी समस्या है। कौन इसके लिए दोषी है यह कहना मुश्किल है। लेकिन अगर समस्या है तो उसका हाल भी ज़रूर होगा। समस्याएं बड़ी डरपोंक होती हैं, अकेले कहीं नहीं जाती। हमेशा अपने साथ समाधान को ले जाती हैं।
प्रख्यात समाजवादी चिंतक किशन पटनायक जी के लेखों के संकलन की किताब है -"विकल्पहीन नहीं है दुनिया।" इसमें इसी शीर्षक से लिखे लेख में किशन पटनायक ने अमेरिकी शासन के चरित्र, उनकी स्थिति और उसकी धौंसपट्टी की चर्चा करते हुए कुछ ऐसा लिखा था:
"ऐसा नहीं है कि अमेरिका के इस साम्राज्यवादी रवैये का कोई विकल्प नहीं है। आज अगर दुनिया के बाकी देश अमेरिका का आर्थिक बहिष्कार कर दें तो अमेरिका बर्बाद हो जाएगा। वह फौरन अपना बहिष्कार करने वाले देशों पर हमला कर देगा।"
यह लेख आज से बीस-पचीस साल पहले लिखा गया था। पता नहीं उसकी लिखी बातें बदले समय में कितनी प्रासंगिक रह गई हैं। लेकिन इस दिशा में सोचा तो गया है।
मजे की बात कि "विकल्पहीन नहीं है दुनिया।" के नए संस्करण में इसी नाम से लिखा लेख ग़ायब है। मैं खोज रहा हूँ किशन पटनायक जी का लेख -"विकल्पहीन नहीं है दुनिया" लेकिन अभी तक मिला नहीं है। कोई मित्र उपलब्ध करा सकेगा तो उसका आभारी रहूँगा। रोचक, पठनीय और विचारणीय लेख है।
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